हरियाणा में सिरसा लोकसभा क्षेत्र की अहम सीट है. सिरसा लोकसभा सीट का गठन 1962 को हुआ था, तब से इस सीट पर बीजेपी को कभी कामयाबी नहीं मिली है. हालांकि कहा जाता है कि इस सुरक्षित सीट को लेकर बीजेपी कभी गंभीर नहीं दिखाई दी, इसलिए 2014 में बीजेपी ने गठबंधन के बाद इस सीट को हजकां के लिए छोड़ दिया था. सिरसा लोकसभा सीट पर ज्यादातर कांग्रेस के उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं.

1962 से अब तक इस सीट पर कांग्रेस को 9 बार जीत मिली है, जबकि INLD को यहां 1989, 1998, 1999 और 2014 में विजय का सेहरा बंधवाने का मौका मिला था.

बीजेपी ने इस सीट पर 2004 में महाबीर प्रसाद को उम्मीदवार बनाया था, जिन्हें 13.68 फीसदी वोट मिले थे. सिरसा लोकसभा सीट की खासियत यह है कि यह तीन जिले सिरसा, फतेहाबाद और जींद तक फैली है.

सिरसा का इतिहास प्राचीन और गौरवपूर्ण रहा है. सिरसा शहर का धर्म, राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान है. देश में सबसे अधिक गौशालाएं सिरसा में हैं. कृषि के क्षेत्र में भी सिरसा का नाम आता है, कपास उत्पादन में सिरसा का अहम स्थान है, जहां तक राजनीति की बात है तो सिरसा लोकसभा सीट गठन के बाद से ही सुरक्षित है, और ज्यादातर इस पर कांग्रेस का कब्जा रहा है. लेकिन 2014 में इंडियन नेशनल लोकदल (INLD) ने इस सीट पर बाजी मारी, इस सीट पर बीजेपी को कभी जीत नहीं मिली है. तीन पार्टियों में मुकाबला

जहां तक 2019 के लोकसभा चुनाव का सवाल है तो सिरसा सीट पर INLD और कांग्रेस के बीच मुकाबला होना तय है. लेकिन राज्य की सत्ता में बीजेपी है, तो वो भी इस सीट पर पहली बार कामयाबी के लिए पूरी ताकत लगा देगी.

2014 का जनादेश पिछले लोकसभा चुनाव में इंडियन नेशनल लोकदल के चरणजीत सिंह रोड़ी ने 1,15,736 वोट जीत हासिल की थी. चरणजीत सिंह को 39.59 फीसदी वोट के साथ 5,06,370 में मत मिले थे, जबकि कांग्रेस के अशोक तंवर को 30.54 फीसद वोट के साथ कुल 3,90,370 वोट पड़े थे. बीजेपी समर्थिक हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) के डॉ. सुशील इंडोरा को 2,41,067 वोट प्राप्त हुआ था.

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