गुरु तेगबहादुर की कहानी, सच जिसे किताबों से हटाया गया।

गुरु तेगबहादुर की कहानी

गुरु तेगबहादुर की कहानी, सच जिसे किताबों से हटाया गया:-

#वाहेगुरु_जी_दा_खालसा !
#वाहे_गुरु_जी_दी_फतेह !!

दरबार सजा हुआ था. प्रतीक्षा हो रही थी गुरु तेगबहादुर जी की. दिल्ली का बादशाह पूरे भारत के इस्लामीकरण के सपने की दहलीज़ पर था. दरबारी और दरबारी लेखक, साहित्यकार अपनी अपनी कलमों को लेकर इस क्षण को कैद करने के लिए बैठ गए थे. कश्मीरी पंडितों का क़त्ल कराते कराते औरंगजेब थक भी गया था. कश्मीर से कुछ पंडित गुहार लेकर गुरु तेगबहादुर के पास पहुँच गए थे. किस तरह उन्हें मारा जा रहा था? कैसे मंदिर जलाए जा रहे थे? गुरु को लगा कि देश को इस अन्याय से बचाने के लिए बलिदान तो देना ही होगा. परन्तु किसका? फिर इस प्रश्न पर स्वयं ही जैसे मुस्करा दिए हों! दरबार में संदेशा भिजवाया गया कि अगर मैं इस्लाम में मतांतरित हो जाऊं, तो पूरे भारत को इस्लाम में मतांतरित कर लेना, और यदि मैं नहीं हुआ, तो यह जिद्द छोड़नी होगी!
“आलमगीर बनने का मार्ग इतना निकट है!” औरंगजेब मुस्करा पड़ा था. यह मुस्कान इतिहास में दर्ज होने की थी. मगर उसे नहीं पता था कि यह क्षण उसकी सबसे बड़ी पराजय बनेगा. और फिर वह दिन आया, जब आलमगीर को अपनी पराजय देखनी थी. अभी तक दारा की हंसी और समरद का कटा सिर उसे उपहास उड़ाते दिखते थे. मगर आज वह उस उपहास की हंसी से पार पा जाएगा! दरबार सज गया. गुरु तेगबहादुर को सामने लाया गया.
“तो आप इस्लाम क़ुबूल करने के लिए तैयार हैं?” काजी ने विजयी मुस्कान से पूछा
“नहीं! बिलकुल नहीं!” गुरु का ठंडा स्वर अक्टूबर के ठंडे मौसम को और सर्द कर गया. लेखकों की कलम रुक गयी! अरे! यह क्या हुआ? औरंगजेब को लगा जैसे समरद ही सामने आ गया हो! जिसने कहा था कि दारा इस दुनिया का बादशाह बनेगा! “नहीं आज मैं नहीं हार सकता! आज इन सभी को हारना होगा!” दारा की आवाज़ औरंगजेब को बार बार विचलित कर रही थी!
तभी फिर से दरबार में गुरु की शेर जैसी आवाज़ गूंजी “मैंने कहा था कि अगर मैं इस्लाम में मतांतरित हो गया तो कश्मीर सहित पूरे हिन्दुस्तान को इस्लाम में मतांतरित कर लेना और अगर मैं नहीं हो पाया, तो यह जिद्द छोडनी होगी!” औरंगजेब को ही नहीं पूरे दरबार को समझ नहीं आ रहा था, कि गुरु क्या कह रहे हैं? गुरु का यह कहना अपने आप में चुनौती थी. पर क्रांतिकारी चुनौती से कब डरते हैं? गुरु क्रान्ति करने के लिए ही तो इस दरबार में आए थे. यह जानते हुए कि वह वापस न लौटेंगे! परन्तु उनका बलिदान और लोगों को संघर्ष के लिए प्रेरित करेगा. बादशाह का खोखलापन उसकी आवाज़ से झाँक रहा था. कल जब पूरी दुनिया को पता चलेगा कि उसके सामने आँखों में आँखें डालकर हज़ारों लोगों के सामने उसे मना कर दिया गया? क्या असर होगा? वह बार बार कुछ सोचता? फिर एक नजर ऊपर की तरफ जाती, दारा की बात याद आती “तुम तलवार के बल पर अपने मज़हब को बदनाम कर रहे हो!”
गुरु की निर्भीक हंसी ने एक बार फिर कहा “तुम मेरे शरीर को मार सकते हो, मेरी आत्मा नहीं!”
गुरु हंस रहे थे, बादशाह हार रहा था, जो मन से पराजित होता है वही हिंसा करता है, और उसकी इस हिंसा को दरबारी हुलस हुलस पर वीरता बताते हैं.
कायरता से गुरु का सिर काट दिया गया, मगर लेखकों ने इस कृत्य पर बादशाह को कोसा नहीं!
उन पर नमक का कर्ज होता है! इसे भी उन्होंने अपने बादशाह की बहादुरी कहा! बदले में उन्हें मुफ्त में आवास और सवारी भी शायद मिला करती हो!
पर नायक दरबारियों से छिपते नहीं हैं

कोटि कोटि नमन है गुरु तेगबहादुर सिंह जी को ।

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