धारा 370 और इसका इतिहास , indiandiary

आज हम आपको धारा 370 के  इतिहास के बारे में बताएँगे

 

 

धारा 370 के इतिहास पर भी एक नजर डालना आवश्यक है. जम्मू-कश्मीर को विशेष प्रस्थिति देने सम्बन्धी ड्राफ्ट 306-क बनाया गया जिसे बाद में 17 अक्टूबर 1947 को संविधान-सभा में धारा 370 के रूप में अयंगार द्वारा पारित करवाया गया. भारतीय संविधान का जो प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागु हुआ उसकी घोषणा राष्ट्रपति ने 1950 संविधान आदेश 1950 द्वारा जारी किया जिसमे प्रावधान था की संसद प्रतिरक्षा, विदेश कार्य तथा संचार के विषय में जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में कानून बना सकती है। धारा 370 के अनुसार जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा राज्य के संविधान का निर्माण करेगी और यह निश्चित करेगी की संघ की अधिकारिता किन क्षेत्रों में या विषयों पर होगी. जम्मू-कश्मीर संविधान संशोधन अधिनियम 1951 के तहत वंशानुगत प्रमुख के पद को समाप्त कर निर्वाचित सदर-ए-रियासत को राज्य का प्रमुख बनाया गया. 1952 में दिल्ली में भारत सरकार तथा जम्मू-कश्मीर राज्य संविधान सभा के लंबित रहने पर कुछ विषयों पर संघ को अधिकारिता प्रदान की गयी. इस समझौते की अन्य महत्वपूर्ण बातें निम्नलिखित है: 

धारा 370 और इसका इतिहास

धारा 370 और इसका इतिहास

 

1. भारत सरकार इस बात पर सहमत हुए की जहाँ अन्य राज्यों के मामले में अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास होगी वही जम्मू-कश्मीर की स्थिति में ये शक्तियाँ राज्य के पास ही रहेगी।

2. जम्मू-कश्मीर के निवासी भारत के नागरिक माने जायेंगे लेकिन उन्हें विशेष अधिकार एवं प्राथमिकताएँ देने संबंधी कानून बनाने का अधिकार राज्य विधान सभा को होगा.

3. भारत संघ के झंडे के अतिरिक्त जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा होगा।

4. सदर-ए-रियासत अन्य राज्यों के राज्यपाल के समकक्ष की नियुक्ति जहाँ अन्य राज्यों में संघ सरकार तथा राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी वहीँ जम्मू-कश्मीर के मामले में यह अधिकार राज्य विधान सभा की होगी।

5. राज्य में न्यायिक सलाहकार मंडल के अस्तित्व के कारन सर्वोच्च न्यायलय को केवल अपीलीय क्षेत्राधिकार होगा।

6. दोनों पक्ष इस बात पर सहमत है की राज्य विधान मंडल के निलंबन से सम्बन्धित अनुच्छेद 356 तथा वित्त आपात से सम्बन्धित अनुच्छेद 360 जरूरी नही है. 1954 में जम्मू-कश्मीर संविधान सभा ने पुष्टि की की भारत संघ में जम्मू-कश्मीर का विलय अंतिम है. इसके बाद राष्ट्रपति ने राज्य सरकार से परामर्श करके संविधान आदेश जारी किया जिसके तहत 1963, 1964, 1065, 1966, 1972, 1974, 1976, एवं 1986 में संशोधन किया गया. बावजूद इसके धारा 370 की विकरालता बनी हुई है. इन संशोधनों का उद्देश्य उस महाभूल का आंशिक शोधन मात्र ही है जिसकी परिणति सिर्फ इतना है की जम्मू-कश्मीर भारत के हाथ से खिसकने के स्थान पर कानूनी शिकंजों के सहारे जकडा हुआ है जिसे तोडने के लिए पाकिस्तान, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी, उग्रावादी एवं अलगाववादी जी जन से जुटे हुए है।

धारा 370 और इसका इतिहास

इन संशोधनों के बावजूद संसद:

1. सातवी अनुसूची में वर्णित विषयों पर जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में कानून नही बना सकती.

2. जम्मू-कश्मीर राज्य के नाम या राज्य क्षेत्र में संघ सरकार अपनी मर्जी से कोई परिवर्तन नही कर सकती है.

3. राज्य के किसी भाग के व्ययन को प्रभावित करने वाले किसी अंतर्राष्ट्रीय करार या संधि के सम्बन्ध में कानून नही बना सकती है.

4. राष्ट्रपति द्वारा अनु. 352 के अधीन जारी राष्ट्रिय आपात की घोषणा राज्य सरकार की सहमति के बिना प्रभावी नही हो सकती है.

5. अनु.360 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा घोषित वित्तीय आपात लागु नही होगी.

6. अनु. 19(1)(ड.) में वर्णित भारत के राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में निवास करने तथा बस जाने की स्वतंत्रता जम्मू-कश्मीर में लागु नही होगी.   

धारा 370 और इसका इतिहास

 

7. राज्य के नीति के निदेशक तत्व जम्मू-कश्मीर में लागू नही होगी.

8. संसद द्वारा संविधान में किया गया संशोधन राज्य में तभी लागू होगी जब राज्य सरकार की सहमति से अनु. 370(1) के अधीन घोषणा की जाय. इतना कुछ होने के बाबजूद नेशनल कांफ्रेंस की सरकार गला फाड़कर अधिक स्वायत्तता की मांग करता रहता है. राज्य विधान मंडल में ध्वनि मत से स्वायत्तता प्रस्ताव पारित हो जाता है और 1953 के पूर्व की स्थिति बहाल करने की मांग की जाती है, परन्तु आतंकवाद की समाप्ति और बेरोजगारी दूर करने आदि पर विधेयक नही लाया जाता है. सच कहा जाय तो यह अधिक स्वायत्तता की आड. में जम्मू-कश्मीर राज्य को वापस उसी गर्त में ले जाने का षड्यंत्र है जहाँ अलगाववादियों तानाशाह स्थापित करने का ख्वाब देखनेवालों एवं पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों को मनमानी करने की खुली छूट मिल जाये. जैसा की राज्य स्वायत्तता समिति की रिपोर्ट में कहा गया है:

1. भारतीय संविधान के भाग 21 के शीर्षक से ‘अस्थायी’ शब्द हटा दिया जाय और धारा 370 के सम्बन्ध में ‘अस्थायी’ उपबन्ध के स्थान पर ‘विशेष उपबन्ध’ लिखा जाय.

2. संघ सूची के विषय जो सुरक्षा, विदेशी मामलों एवं संचार अथवा उसके अनुषंगी न हो उसे राज्य में लागु नही किया जाय.

धारा 370 और इसका इतिहास

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3. जम्मू-कश्मीर विधान मंडल का चुनाव राज्य संचालन बोर्ड के अधीन हो न की केन्द्रीय चुनाव कमीशन के.

4. आपात स्थिति लागू करने से पूर्व राज्य सरकार की सहमती आवश्यक होगी. अनु. 352 में संशोधन किया जाय एवं अनु. 355-360 जम्मू-कश्मीर में लागु न किया जाय जैसा की 1954 के पूर्व था.

5. जम्मू-कश्मीर की संविधान में मूलभूत अधिकारों का एक अलग अध्याय जोडने की जरूरत है.

6. अनु. 218 जम्मू-कश्मीर में लागु नही किया जाय और इस सम्बन्ध में राज्य विधान मंडल फिर से कानून बनाने के लिए स्वतंत्र हो.

7. संघलोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति राज्य में समाप्त कर दिया जाय.

8. भारतीय संविधान द्वारा दलितों को दिए गए आरक्षण को जम्मू-कश्मीर के मामले में राज्य संविधान में स्थानांतरित कर दिया जाय. धारा 370 और इसका इतिहास

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9. मुख्यमंत्री वजीर-ए-आजम एवं राज्यपाल सदर-ए-रियासत कहा जाय एवं राज्यपाल की नियुक्ति राज्य सरकार की सहमति से हो. उपर्युक्त तथ्यों का आधार धारा 370 ही है और उपर्युक्त बातों के अध्ययन से स्पष्ट है की इसके तहत दो प्रधान, दो विधान और दो निशान की बात आती है जो किसी भी राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए खतरा है. यह दुखद है की भारत एवं जम्मू-कश्मीर सहित पुरे भारतीय प्रारंभिक गलतियों का दुष्परिणाम आज तक झेलते आ रहे है. इसी का दुष्परिणाम है की कश्मीरी मुसलमान कश्मीर को भारत से अलग मुल्क समझते है और पाक स्थित आतंकवादी, अलगाववादी कश्मीरियों को बरगलाकर आतंकवाद, उग्रवाद के रास्ते पर ले जाने में सफल होते है. वे कश्मीरी नवयुवकों को यह बताने में पूरी तरह सफल होते है की कश्मीर भारतीय संविधान द्वारा शासित भारत से जुड़ा एक अलग मुल्क है. यही कारन है की २४ आतंकवादी दलों का समूह हुर्रियत कांफ्रेंस कश्मीर घाटी में अपना प्रभाव होने की बात करता है और आजाद कश्मीर का स्वप्न देखता है. हुर्रियत कांफ्रेंस का चेहरा एक ओर पाकिस्तान से घिरा मुखौटा है तो दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर में तानाशाह शासक बनने की ललक. पाकिस्तान दुहरी चल चल रहा है. एक तरफ तो तथाकथित जेहादियों, आतंकवादियों और अलगाववादियों को खुला समर्थन देकर कश्मीर को भारत से अलग करना चाहता है तो दूसरी ओर राजनीती में इनका प्रवेश कराकर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है. राजनीती और जनता तक इनका प्रवेश जम्मू-कश्मीर से बाहर के भारतीय क्षेत्रों में भी हो चूका है जो देश के लिए खतरनाक है. वृहत स्वायत्तता की मांग करनेवालों का ध्यान वहाँ की आर्थिक बदहाली, बेकारी, अपराध और आतंकवाद आदि समस्याओं पर नही जाता है. स्कुल और कॉलेज नही है, परिणामतः मदरसों का सहारा लेना पड़ता है और मदरसों में मुल्ला क्या पढते है य जग जाहिर है। पाकिस्तान में अधिकांश मदरसों पर जनरल मुशर्रफ ने इसलिए प्रतिबंध लगा दिया क्योंकि वे कट्टरवाद और आतंकवाद की शिक्षा दे रहे थे। कलम और बंदूक की शिक्षा साथ-साथ चो रही थी. आतंक्वादियों, अलगाववादियों को जम्मू-कश्मीर में राजनितिक संरक्षण प्राप्त है. राज्य के विकास के लिए हर साल दी जानेवाली रकम का क्या होता है कुछ पता नही। इन पैसों का दुरूपयोग बम-गोला खरीदने में होता हो तो कोई आश्चर्य नही। रुबिया अपहरण कांड का नाटक ऐसे ही राजनितिक संलिप्तता को उजागर करता है जिसमे जे के एल एफ के नेता यासीन मलिक एवं अडतीस उग्रवादियों, अलगाववादियों को बेबजह रिहा किया गया। प्रश्न यह है की यह कबतक चलता रहेगा? कबतक धरती का स्वर्ग कश्मीर खून की होली खेलता रहेगा? शायद तबतक जबतक धारा 370 जैसे काले कानून को निरस्त कर आतंकवादियों का समूल नष्ट न कर दिया जाये। दूसरा कार्य होगा कश्मीर की जनता में राष्ट्रीयता, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रवाद एवं इस्लाम के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट करना।

धारा 370 और इसका इतिहास

 

उनमे भारत सरकार में विश्वास पैदा करना एवं पाक अधिकृत कश्मीर की बदहांलियो को उजागर कर पाकिस्तान एवं आतंकवाद, अलगाववाद के विरुद्ध खड़ा करना. परन्तु, ये कार्य तभी संभव है जब कश्मीर समस्या को मुस्लिम समस्या और पाकिस्तान हित को मुस्लिम हित के रूप में देखनेवाले और इसका दुष्प्रचार कर देश के भाई-भाई में अलगाव पैदा करने वाले देशद्रोही राजनीतिज्ञों पर अंकुश लगे। ऐसे भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के विरुद्ध जनता में जाग्रति पैदा करना भी आवश्यक है. राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रिती समझौते की वस्तु नही होती. सच तो यह है की किसी भी राजनितिक पार्टी के भरोसे देश की भला होने की अपेक्षा करना आज के माहौल में ठूंठ पेड से फल प्राप्ति की अपेक्षा करना है। इनकी प्रत्येक निति वोट बैंक के मद्दे नजर निर्धारित होती है और राष्ट्रहित पार्टी हित के आगे घुटने टेक देती है। कही ऐसा न हो की शेख अब्दुल्ला जो काम जीते जी नही कर सका इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जाती सापेक्षता करनेवाली पार्टियां अपनी कुकर्मों से बरबस हो कर गुजरे. अतः भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है की समय रहते भारतीय संविधान का ये काला कानून जो भारत माँ के सिने का नासूर बनकर आतंकवाद, अलगाववाद का पीव सतत निस्सृत कर रहा है, को एकजुट होकर खत्म किये जाने की अभियान पर जुट कर देश के सच्चे नागरिक एवं भारत माता के सच्चे सपूत होने का परिचय दे।

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