भारतीय सिनेमा का असली नायक, इंदिरा गांधी और नरेंद्र दामोदरदास मोदी

भारतीय सिनेमा का असली नायक

भारतीय सिनेमा में एक से बढ़कर एक नायक हुए हैं, हर नायक का अपने दौर में एक जलवा रहा है। देव आनंद, शम्मी कपूर, राजेन्द्र कुमार, दिलीप कुमार जैसे अनेक नायकों ने अपने समय में जनता पर ग़ज़ब का जादू किया था। फिर आया राजेश खन्ना का दौर और यहाँ से भारतीय सिनेमा एकदम से बदल गया। राजेश खन्ना का आकर्षक चॉकलेटी चेहरा, उनकी अदाएं, मुस्कुराहट ने पिछले सभी नायकों को कहीं पीछे छोड़ दिया और वो देश के पहले ‘सुपरस्टार’ बने।

आज की कई दादियाँ, नानियाँ उनकी इस क़दर दीवानी थी जितनी इसके पहले किसी नायक की नहीं हुई थी। कोई स्कूल, कॉलेज की किताबों में, कोई पर्स में, कोई तकिये के नीचे राजेश खन्ना की तस्वीर रखती थीं। किसी शहर में राजेश खन्ना आ जाएँ तो उनके लिए चुन्नियाँ सड़क पर बिछा देतीं थीं। राजेश खन्ना एक रोमांटिक हीरो थे सो उनके लिए लड़कियों, महिलाओं की दीवानगी पागलपन की हद तक पार कर गई थी। सफलता के घोड़े पर सवार, स्टारडम का आभामंडल लिए राजेश खन्ना जैसी सफलता पाना भी किसी के लिए महज एक दिवास्वप्न ही हो सकता है। जब निर्माता, निर्देशक उन्हें साइन करने के लिए अलसुबह से और कोई रात रात भर उनके घर के बाहर लाइन लगाकर बैठे रहते थे।

इसी दौर में अनेक कलाकार हुए जैसे धर्मेंद्र, जितेंद्र, विनोद खन्ना, विनोद मेहरा, शशि कपूर लेकिन कोई भी राजेश खन्ना के लिए चुनौती नहीं बन सका था।

भारतीय सिनेमा का असली नायक

फिर आगमन हुआ अमिताभ बच्चन का, फ़िल्म ज़ंजीर में अमिताभ ने जिस अंदाज़ में प्राण उर्फ़ शेर खान को पहले पुलिस स्टेशन में फिर उसी के इलाक़े में जाकर चुनौती दी उसने एक ऐसे नायक को जन्म दे दिया जो कि निडर है और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत रखता है। यहीं से “एंग्री यंग मैन” का तमगा भी अमिताभ के साथ जुड़ गया। अमिताभ की कद काठी, उनकी 6 फ़ीट से ज़्यादा की लंबाई और भारी, प्रभावशाली आवाज़ ने उनको एक ऐसे नायक के रूप में प्रस्तुत किया जो दबे कुचले, अपने परिवार, आसपास अत्याचार सहन कर रहे लोगों का मसीहा बनकर आया था।

राजेश खन्ना के स्टारडम को सेंध लग चुकी थी। प्रकाश मेहरा, मनमोहन देसाई जैसे अनेक निर्माता निर्देशकों ने अमिताभ बच्चन के लिए एक से बढ़कर एक फ़िल्में रचीं। अमिताभ के प्रति लोगों की दीवानगी ने नए नए रिकॉर्ड बना दिये। उस दौर में टिकट ब्लैक करने वालों ने भी अमिताभ की फिल्मों से खूब चांदी काटी, लोगों ने दुगुने, तिगुने से भी ज़्यादा दामों पर अमिताभ की फ़िल्मों के टिकट खरीदे। हर शो हाउसफुल, हर शो के लिए टिकटों की मारामारी, कई दीवाने तो एक ही फ़िल्म को दसियों बार देख आते थे। दीवार, काला पत्थर, लावारिश, नमक हलाल, मि. नटवरलाल, शोले, कालिया जैसी फिल्मों ने अमिताभ को उस मुक़ाम पर पहुँचा दिया जहाँ आजतक कोई भी नायक पहुँच नहीं सका है। अत्याचारी खलनायकों से अकेले ही लोहा लेता नायक जन जन की आवाज़, पहचान बन चुका था। शाहरुख खान ने भी बड़ी सफलता अर्जित की लेकिन वो अमिताभ जैसा मुक़ाम हासिल नहीं कर सके।

“कौन बनेगा करोड़पति” जैसे टीवी शो को जिस अंदाज में अमिताभ बच्चन ने प्रस्तुत किया उसने बता दिया कि वो क्यों सुपरस्टार हैं और क्यों इस ऊँचाई तक पहुँचने के क़ाबिल हैं। वही शो शाहरुख खान ने भी प्रस्तुत किया लेकिन अमिताभ बच्चन उसका पैमाना इतना ऊँचा स्थापित कर चुके थे कि शाहरुख खान उसके कोसों दूर तक भी नहीं पहुँच सके। अनेक पीढियां बचपन से जवान, जवान से बूढ़ी और अपनी दूसरी, तीसरी पीढ़ी को भी बूढ़ा, जवान होते देखती रही लेकिन अमिताभ बच्चन का जलवा आज भी क़ायम है।

भारतीय राजनीति में भी इसी तरह अनेक नेता हुए जिन्होंने जनमानस पर जमकर प्रभाव डाला। उनकी भाषण शैली, कार्यशैली ने जनता को प्रभावित किया। कांग्रेस का प्रभुत्व राजनीति में शुरू से रहा फिर कांग्रेस एक परिवार की निजी संपत्ति, कम्पनी के रूप में स्थापित हो गई। जहाँ पार्टी मतलब केवल नेहरू गांधी परिवार और बाक़ी सभी नेता, कार्यकर्ता केवल उनके गुलाम, चाटुकार बनकर रह गए। कांग्रेस में होड़ ही केवल इस बात की है कौन सबसे बेहतर चाटुकार साबित हो सकता है। कांग्रेस का अध्यक्ष, प्रधानमंत्री पद केवल एक परिवार को समर्पित हो गया। जहाँ योग्यता, अनुभव का कोई महत्व नहीं रह गया। इसीलिए अनेकों चुनाव हरवाने वाले राहुल गांधी आज कांग्रेस अध्यक्ष हैं और उन्हीं के नेतृत्व (?) में आगे भी चुनाव लड़े जाएंगे।

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इंदिरा गांधी के दौर से इस विचारधारा ने ज़ोर पकड़ा, इंदिरा की मृत्यु के बाद बाद राजनीति से दूर हवाई जहाज़ चलाने वाले राजीव गांधी को पकड़कर कांग्रेस अध्यक्ष और फिर देश चलाने के लिए प्रधानमंत्री बना दिया गया।

राजीव के बाद अनेक ग़ैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री हुए लेकिन सिवाय अटल बिहारी वाजपेयी के कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका था। अटलजी की एक सरकार एक वोट से गिरा दी गई थी।

सत्ता पाने के लिए कांग्रेस ने साम दाम दंड भेद हर दाँव चला। सत्ता के बिना कांग्रेस ख़ासकर गांधी परिवार की हालत जल बिन मछली के जैसे हो जाती है और वो इसके लिए बुरी तरह मचलती है। अपने विरोधियों को इंदिरा गांधी भी ठिकाने लगाती रहीं। लेकिन सोनिया गांधी ने अपने कार्यकाल का आरंभ ही सीताराम केसरी जैसे वरिष्ठ नेता को अपमानित करने से किया था।

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सोनिया गांधी के कमान संभालने के बाद से सारी मर्यादाएँ, नियम क़ायदे ताक पर रख दिये गए। जो मैडम ने बोला वही नियम हो गया। देश में घोटालों की शुरुआत तो नेहरू के ज़माने से ही हो गई थी लेकिन सोनिया-मनमोहन के कालखंड में सारी सीमाएँ लाँघ दी गईं।

एक अति महत्वाकांक्षी महिला, ताकतवर महिला जिसके सामने पूरी कांग्रेस नतमस्तक है। ग़ुलामी की बेड़ियों में जकड़े मनमोहन सिंह केवल मैडम के निर्देशों का पालन करते रहे। देश के पहले और संभवतः आखरी ऐसे प्रधानमंत्री जो केवल कठपुतली बने रहे। इसी कालखंड में देश में सबसे ज़्यादा आतंकी हमले हुए, घोटाले भ्रष्टाचार हुए और इनसे भी बढ़कर हिन्दू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद जैसे शब्दों का संसद में भी प्रयोग किया गया जबकि आतंकी हमलों में सबसे ज्यादा लिप्त मुसलमानों के खिलाफ कांग्रेस ने कभी मुँह नहीं खोला। बल्कि मुस्लिम आतंकियों के एनकाउंटर पर सोनिया गांधी ने आँसू तक बहा दिये।

उधर गोधरा कांड से उपजे जनाक्रोश के बीच एक और नायक का जन्म हो चुका था – नरेंद्र दामोदरदास मोदी। सत्ता, राजनीति के लंबे अनुभव से कांग्रेस ने इस बात को बहुत पहले ही भाँप लिया था कि अगर उससे कोई लोहा ले सकता है, उसके साम्राज्य को कोई हिला सकता है तो वो यही नरेंद्र मोदी है। लिहाज़ा सारे हथकंडे अपनाकर, सीबीआई, मीडिया, न्यायपालिका का उपयोग कर मोदी को रोकने, कुचलने, गुजरात तक सीमित रखने की हर संभव कोशिश की गई लेकिन सफल नहीं हो सकी।

भारतीय सिनेमा का असली नायक

कांग्रेस के बिछाए हर जाल को भेदते हुए नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन गए। राजनीति के पहले सुपरस्टार, एंग्री यंग मैन के रूप में मोदी ने कांग्रेस को उसी की भाषा में जवाब दिए, अनेक राज्यों में भाजपा की सरकारें बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पिछले साढ़े चार वर्षों में देश ने देखा कि कैसे कभी असहिष्णुता, कभी अवॉर्ड वापसी, कभी गौमांस जैसे मुद्दों को लाया गया। सर्जिकल स्ट्राइक जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर, रॉफेल सौदे पर झूठ फैलाने जैसे अनेक काम कांग्रेस ने किए।

भारतीय सिनेमा का असली नायक

लेकिन इन सबसे बेपरवाह नायक अपने उद्देश्यों की पूर्ति में लगा है। देश में विकास कार्यों ने रेकॉर्ड बना दिये हैं। विश्व आज भारत को सम्मान की दृष्टि से देख रहा है। चीन, अमेरिका, यूएई पहली बार भारत के मज़बूत नेतृत्व के सामने झुके हैं। पाकिस्तान की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

हम वो भाग्यशाली पीढ़ी हैं जो इस नायक को देख रही है, इसके काम करने, जनता से सीधे संवाद करने के तरीकों को देख रही है। एक राजनीतिज्ञ और प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने इतना ऊँचा पैमाना स्थापित कर दिया है कि कोई नेता इसके आगे जाएगा या इसके आसपास भी पहुँचेगा तो भारत को “विश्व का सुपरस्टार” बनने से कोई नहीं रोक पायेगा।

हे भारत माता आपकी सेवा में ऐसे ही नायकों और सपूतों का जन्म सदा होता रहे और देश का, जनता का गौरव बढ़ता रहे, कल्याण होता रहे यही शुभेच्छा !!

“हज़ारों बरस नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती है”
“बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा” …………. Harshal Khairnar

भारतीय सिनेमा का असली नायक   भारतीय सिनेमा का असली नायक

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