A True Story on Dowry

दहेज़ का दानव, A True Story on Dowry, बेटी है तो जरुर पढ़ें:-

                      प्रसूतिगृह में परबतिया पलंग पर लेटी हुई थी, मुँह सूखा हुआ था, क्या करे कि सास का ताना न सुनना पड़े, क्योंकि तीसरी भी बेटी हुई है। बड़ी आस थी इस बार सास और पति को, कि इस बार तो बेटा ही होगा, अब ?
दोनों का ताना सुनने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, यहाँ दहेज वहेज का चक्कर नहीं था कि सास उसके लिए चिंता करे पर खानदान चलाने वाला तो होना ही चाहिए,
कुछ बातें अनायास दिमाग में कौंध गईं,
अचानक ही चेहरे पर एक स्मित मुस्कान छा गई, आने दो, ताना तो अब वे सुनेंगे ।

A True Story on Dowry


तभी सास कमरे में फटर-फटर चप्पल बजाते हुए प्रविष्ठ हुईं, अरी फिर आ गई मुँहझौसी,
हाँ अम्मा, फिर आ गई मुँहझौसी, अब हम तुम्हारे बेटे के संग नहीं रहेंगे, एक बेटा पैदा करने की भी औकात नहीं,
लगा दी है बेटियों की लाइन, कितना सोचे थे, कि इस बार तो बेटा होगा, पर ऐसे आदमी से ये सुख कहाँ कि बुढ़ापे को संभालने वाला कोई आ जाये, संभालो अपनी बेटियों को, अब हम नहीं रहेंगे यहाँ, मायके जाकर दूसरा लगन करेंगे ।
सास अवाक ! , काहे उल्टी गंगा बहा रही है, बिटिया तू पैदा कर रही है, और दोष हमारे बेटवा पर, पगलाय गई है क्या ?
वाह, तो का हम झूठ कह रहीं हैं अम्मा, भूल गईं वो डाक्टर वाली बात, जो वो गांव के शिविर में बता कर गईं थीं, वोई एक्स औऊर वाई वाली बात कि मरद पर ही होता है कि औरत क्या जनेगी, बेटा या बेटी?

A True Story on Dowry

 


अब हम काहे सहे जे तीन-तीन बिटियन का बोझ।
का फायदा ऐसे मरद का जो एक बेटा भी न दे सके ?

सास माथे पर हाथ रख धम्म से वहीं बैठ गई, और परबतिया की मुस्कान छत्तीस इंच वाली,
बेटी को प्यार से देखा, मुस्कायी और मन ही मन कहा,
अभी तुम्हरी अम्मा जिंदा है बिटिया, अब देखे कोई ताना मार कर……..

जब बेटी बड़ी हुयी:-

A True Story on Dowry

 

पाँच sal की Beti बाज़ार में गोल गप्पे खाने के लिए मचल गई। ?? “किस भाव se दिए भाई?” Papa नें सवाल् किया। “10 रूपये के 8 दिए हैं। गोल गप्पे वाले ने जवाब दिया…… Papa को मालूम नहीं था गोलगप्पे इतने महँगे हो गये है….जब वे खाया करते थे तब तो एक रुपये के दस मिला करते थे। . Papa ने जेब मे हाथ डाला पंद्रह रुपये बचे थे। बाकी रुपये घर की जरूरत का सामान लेने में खर्च हो गए थे। उनका गांव शहर se दूर है दस रुपये to बस किराए me लग जाने है। “नहीं भई पांच रुपये में दस दो तो ठीक है वरना नही लेने।

यह सुनकर Beti नें मुँह फुला लिया…. “अरे अब चलो भी , नहीं लेने इतने महँगे। Papa के माथे पर लकीरें उभर आयीं …. “अरे खा लेने दो ना साहब… अभी आपके घर में है तो आपसे लाड़ भी कर सकती है… कल को पराये घर चली गयी तो पता नहीं ऐसे मचल पायेगी या नहीं. … तब आप भी तरसोगे बिटिया की फरमाइश पूरी करने को… गोलगप्पे वाले के शब्द थे तो चुभने वाले पर उन्हें सुनकर Papa को अपनी बड़ी Beti की याद आ गयी….

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जिसकी शादी उसने तीन sal पहले
एक खाते -पीते पढ़े लिखे parivar में की थी……

उन्होंने पहले sal se ही उसे छोटी
छोटी बातों पर सताना शुरू कर दिया था…..

दो sal तक वह मुट्ठी भरभर के
रुपये उनके मुँह में ठूँसता रहा पर
उनका पेट बढ़ता ही चला गया ….

और अंत में एक दिन सीढियों se
गिर कर Beti की मौत की खबर
ही मायके पहुँची….

Aaj वह छटपटाता है
कि उसकी वह Beti फिर se
उसके पास लौट आये..?
और वह चुन चुन कर उसकी
सारी अधूरी इच्छाएँ पूरी कर दे…

पर वह अच्छी तरह जानता है
कि अब यह असंभव है.
“दे दूँ क्या बाबूजी

गोलगप्पे वाले की आवाज se
पापा की तंद्रा टूटी…

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“रुको भाई दो मिनिट ….
पापा पास ही पंसारी की दुकान थी उस पर गए जहाँ se जरूरत का सामान खरीदा था। खरीदी गई पाँच किलो चीनी में se एक किलो चीनी वापस की तो 40 रुपये जेब मे बढ़ गए।

फिर ठेले पर आकर Papa ने डबडबायी आँखें
पोंछते हुए कहा
अब खिलादे bhai, हाँ तीखा जरा कम डालना। मेरी बिटिया बहुत नाजुक है….
सुनकर पाँच वर्ष की गुड़िया जैसी Beti की आंखों में चमक आ गई और Papa का हाथ कस कर पकड़ लिया।

मुझे यह फारवर्ड प्राप्त हुआ है लेखक का पता नहीं लेकिन जिसने भी लिखा है बहुत सुन्दर लिखा है दिल को छू लेने वाला लिखा है, शेयर जरुर करें !

A True Story on Dowry

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