Chhoti si shikayat - कविता - छोटी सी शिकायत मुझे अपने आप से, बेटे भी घर छोड़ जाते हैं

Chhoti si shikayat – कविता – छोटी सी शिकायत मुझे अपने आप से:-

 

तुम जो रोज हमारे पास रहकर भी यू हमसे दूर दूर रहते हो
हमे अच्छा नही लगता …..
तुम जो हमारे वक़्त पे भी हमे वक़्त नही दे पाते हो

हमे अच्छा नही लगता…..
तुम से शिकायत करु या शिकवा कुछ भी कहो

ऐसा करना हमे अच्छा नही लगता…..
में जानती हूं जिंदगी में तुम्हारी हमसे भी ज्यादा ओर भी

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कई खास है…..
कुछ तुम्हारे काम और कुछ तुम्हारे नाम
कुछ वक्त हमे भी दे दो तुम्हारा जिस पे
सिर्फ हमारा ही नाम हो……

जब भी वक़्त नही दे पाते हो कह देते हो तुम …..
अरे यार आज में कहि फंस गया था…
आज मुझे किसी ने रोक लिया था ..
आज मुझे काम ने वक़्त ही नही दिया
के तुम्हारे साथ वक़्त बिता सकू…
में इतना ही कहूंगी के तुम्हारे इस “मै” में
हम कहा है…..
कहा हु में कहा हो तुम जो मिलकर हम बन सके..

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कह देते हो तुम मुझसे के एक तुम ही तो हो जो
मुझे अच्छे से समझती हो …
कह देते हो तुम.. तुम तो बहुत समझदार हो
मेरी मजबूरी ओर मेरी परेशानियों को समझोगी…
हाँ.. में समझती हूं सब तुम्हारी मजबूरी भी..
तुम्हारी परेशानियां भी.. तुम्हारी समझदारी भी..
पर …क्या कभी… तुम समझते हो
जिस दिन तुम से मेरी बात नही होती तो
कैसे में बावरी सी बन के रहती हूं…

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क्या तुम समझते हो …मेरे लिए
तुम्हारे मेरी जिंदगी में क्या मायने है …
में ये नही कहती के हर वक़्त तुम बस मेरे ही साथ रहो
बस में इतना चाहती हु के …
जो थोड़ा सा वक़्त मेरा है उसे सिर्फ मेरा ही रहने दो
जो पल में तुम्हारे साथ तुम्हारे बिना जीती हु
वो पल मुझे संजोने का मौका तो दो…
तुम्हारे इंतजार में….आशा है कभी तो ये
इंतजार खत्म होगा….

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एक  छोटी  सी  शिकायत  है  मुझे  अपने  आप  से ,
तेरा  ख्याल  हर  पल  दिल  में  आने  की  आदत  है ।

नज़ारे  मिलकर  फिर  चुराने  की  ये  शरारत  है ,
हसरतों  की  चल  रही  संयमता  से  बगावत  है।

तुम्हे  जीताकर  तुमसे  ही  हरने  की  चाहत  है ,
तुम्हे  कैसे  कह  दूँ  की  मुझे  तुमसे  ही  मोहब्बत  है ।

आ ढूंढते हैं एक दूजे को भूली बिसरी यादों में,
शायद फिर हो जाए मोहब्बत बातों ही बातों में….

खुल सकती हैं गांठें बस ज़रा से जतन से,
न जाने क्यों लोग कैंचियां चला कर, सारा फ़साना बदल देते हैं…!

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बुरा न मानिए जो मेरा लहज़ा कुछ तीख़ा है
मैंने तो हज़ूर यह आप ही से सीखा है

मैं जी जी से बुलाऊं आप तू तू से बात करें
गुफ्तगू का भला ये कौन सा तरीका है

न्योते की महज वो रसम निभाने आए हैं
दावत तो दी है पर अंदाज़ बड़ा फीका है

दुश्मन से बदला इस वज़ह से न ले पाये
दिखने में लगता वो कोई दोस्त सरीखा है

कितनी देर बाद दर्द का अहसास हुआ उसे
मुद्दत हुई चोट खाए , अब जा के चीखा है

सफर का मज़ा लेना शुरू किया है जबसे
रास्ता ही हमें अब मंज़िल सा दिखा है

आप को न पसंद आए वो अलग बात है
‘ राज ‘ ने जब भी लिखा है रूह से लिखा है

राजिंदर सिंह ‘ बग्गा ‘

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