जो दिल में ‘दाग़’ न होते पढ़े उर्दू के बड़े शायर दाग़ देहलवी की शायरी

जो दिल में ‘दाग़’ न होते पढ़े उर्दू के बड़े शायर दाग़ देहलवी की शायरी
जो दिल में ‘दाग़’ न होते पढ़े उर्दू के बड़े शायर दाग़ देहलवी की शायरी

दाग़ देहलवी को गालिब और जौक जैसे उस्तादों की शागिर्दी और संगत मिली थी, फिर भी उनकी गजलों और शायरी में इन अज़ीम शायरों से इतर एक अपनी ही छाप दिखती है.

दाग़ देहलवी का असल नाम नवाब मिर्जा खां था. ‘दाग़’ नाम उन्होंने अपने भीतर के शायर के लिए चुना. देहलवी यानी दिल्ली का या दिल्लीवाला, इसे उन्होंने अपना तखल्लुस बनाया. वह दिल्ली जो लगातार उनसे एक खेल खेलती रही. जो कभी तो मां की तरह उन्हें सीने में छिपाती रही तो कभी किसी बेवफा प्रेमिका की तरह उन्हें अपने दिल से बेदखल करती रही.

  1. तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
    वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता
  2. दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे
    जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे
  3. हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के ‘दाग़’
    जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं
  4. इस नहीं का कोई इलाज नहीं
    रोज़ कहते हैं आप आज नहीं
  5. आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले
    आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले
  6. आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
    बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
  7. वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
    तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
  8. आप का ए’तिबार कौन करे
    रोज़ का इंतिज़ार कौन करे
  9. मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
    मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है
  10. ख़बर सुन कर मिरे मरने की वो बोले रक़ीबों से
    ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियाँ थीं मरने वाले में
  11. हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे
    तुम्हें है शर्म तो आँखों पे हाथ धर लेना
  12. ग़ज़ब किया तिरे वअ’दे पे ए’तिबार किया
    तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
  13. लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद
    हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं
  14. शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को
    ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का
  15. अर्ज़-ए-अहवाल को गिला समझे
    क्या कहा मैं ने आप क्या समझे
  16. साक़िया तिश्नगी की ताब नहीं
    ज़हर दे दे अगर शराब नहीं
  17. लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से
    इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे
  18. बड़ा मज़ा हो जो महशर में हम करें शिकवा
    वो मिन्नतों से कहें चुप रहो ख़ुदा के लिए
  19. आओ मिल जाओ कि ये वक़्त न पाओगे कभी
    मैं भी हम-राह ज़माने के बदल जाऊँगा
  20. ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
    साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

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