Dillagi

Dillagi, “दिल्लगी” किस्सा एक हनीमून का जो दिल को छु जायेगा:-

 

एक शादी हुई।लड़की बहुत हसीन थी,
एकदम परी जमाल,शहद की शीशी,अदा और
नजाकत का शराबी मेल और लड़का भी जैसे
मर्दानगी का मुजस्समा,लहीम शहीम,ऊंचा
लंबा कद, बेहद जहीन और एक कामयाब
आईआईटियन…।

दोनो शादी के फौरन बाद हनीमून के लिए
गुलमर्ग गये। लड़का अपने कैरियर बनाने के
चलते और अपनी मां की कठोर तरबिअत के
चलते कभी ज्यादा किताबों से इधर उधर नहीं
हुआ था जाहिर किसी लड़की को अब तक
बहुत करीब से कभी नहीं देखा था,पहली बार
एक फुरसत मिली थी वो भी एकदम निजी सो
बस ऐसी हुस्नपरी को पा कर वो निहाल हो गया,
निहाल भी इतना कि बस टाईटैनिक
जहाज़ की तरह उसके गुदाज़ जिस्म की
अतल गहराइयों में गुम ही हो गया।सोते
जागते जरा सी भी दूरी एक तकलीफ का
सबब थी और फिर उसे वो लड़की,हंसती बोलती,
उठती बैठती ,हर अदा से हर लिहाज़
से बेहद खास लगी बस हर वक्त उसी में लिपट
रहने का जी करता,एक एक करके कई दिन
बीत गये,तब जा कर दीवार से लगे कलैन्ड़र
की तरह जाता वक्त दिखाई पड़ा और दूसरी
चीजें भी साफ दिखाई देने लगीं तो सुबह
अपनी बीवी से बोला,”चलो कहीं बाहर चलते
हैं,घूमने,किसी दरख्त के नीचे बैठेगें,एक दूसरे
से बातें करेगें…मैं अपनी कहूंगा कुछ तुम्हारी
सुनूंगा…। Dillagi

“बीवी भी जो बंद दीवारों में उकता
गई थी खुश हो गई लिहाजा दोनों घूमने निकले
और थक कर एक दरख्त के पास एकपैरासोल
के नीचे एक मेज के गिर्द कुर्सियों पर बैठ गये।
“अपना कोई किस्सा सुनाओ…किसी और …
लड़के से किसी मुलाकात का जिक्र…।”
लड़की जो अब इस गलतफहमी का शिकार
थी कि लड़का उस के हुस्न की मुट्ठी में कैद
हो चुका है…मजे ले कर बोली..”झूठा सुनाऊं
या सच्चा..।”लड़का भी विनोद से बोला,”कोई
है तो सच्चा ही सुनाओ…।” लड़की एक पल
सोचती रही…फिर अपनी नशीली आंखें झपका
कर बोली,”ठीक है सुनो…हमारे ही मुहल्ले का
लड़का था…बिल्कुल तुम्हारे जैसा…हमेशा
पढ़ता ही रहता था…और मुझे गुमान था शुरू
से अपने पे…कि मुझको …और कोई न देखे
न चाहे तो लानत मुझ पर….बस वो लड़का..
मुझे चुभने लगा…जब भी मेरे पास से गुजरे…
एक उचटती सी नज़र से देख कर…आंखें…
झुका ले…और मेरी जिद बढ़ती गई…मैं कई
बार उसके पास …अपने कोर्स की प्रोब्लम
ले के गई…पर फिर भी वो बड़े तमीज़ से बस
उसे सोल्व कर दे…और बात खत्म।

Dillagi

आखिर इस चूहे बिल्ली के खेल में एक
दिन मौका मिला,मुहल्ले में एक बड़ी शादी थी
…पूरे मुहल्ले को न्यौता मिला था…मैं पेट दर्द
का बहाना करके घर पे रह गई…मुझे पता था
वो तो ऐसी भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जाता
ही नहीं है..और वाकई वो गया भी नहीं था..
मैं मुहल्ले में सन्नाटा होते ही कापी किताब ले
के उस के कमरे में पंहुच गई…हमेशा की तरह
वो बोला,”निकालिए अपना सवाल…।”
मैं बोली,”आज सवाल…तुम से है..क्या मैं
सुंदर नहीं हूं…तुम्हें जरा नहीं भाती…?”
वो मुस्कुराया,”तुम..बेहद सुंदर हो…मुझे अच्छी
भी लगती हो…पर हम एक मुहल्ले के हैं…
हमारे बीच…कुछ मुमकिन नहीं है..।”
“थौड़ी हंसी दिल्लगी भी नहीं..ऐसी भी क्या
बेरूखी..।”कहते कहते मैंने उसका हाथ पकड़
लिया…अब वो खुद पे काबू नहीं रख सका..
मुझे अपने आगोश में ले लिया और लगा..
बेतहाशा मुझे चूमने…एकबारगी ऐसा लगा मैं
जीत के करीब हूं…एक मदहोशी का आलम
था…और उसके हाथ जगह जगह…मुझे..छू
रहे थे कि सहसा वो रूक गया…”नहीं…इसके
आगे नहीं…तुम जाओ…यहां से।”मैं बस चुप
बेइज्जत सी नीचे सीढ़ियां उतर गई….और
बस…किस्सा खत्म…।”

Dillagi

सामने बैठे लड़के का मुंह क्षोभ और गुस्से
से विवर्ण हो रहा था…कनपटी पर शिराएं
उभर आई थीं…लड़की इससे पहले कि कोई
सफाई देती..लड़का अपनी जगह पर खड़ा हो
गया…गुस्से से तमतमाया,”तो ये है तुम्हारी
हकीकत…तुम्हारा असली चेहरा….।”
“पर इस किस्से का एक लफ्ज़ भी सच नहीं है
मैंने तो तुम्हे सताने की गरज़ से….।”
“रहने दो…अब क्या सच..और…क्या.झूठ..
मुझे पहले ही सोच लेना चाहिए था तुम विष
का भरा सोने का घड़ा हो…।”
अब लड़की सचमुच घबरा गई..और सुबकने
लगी…पर लड़का पसीजा नहीं…उसका सारा
प्यार दुलार पत्थर का हो गया…।
अगले दो घंटे बाद सामान समेटे दोनो
टैक्सी में वापस लौट रहे थे…हनीमून समाप्त
हो चुका.. था…।
अजय कुमार

Dillagi

 

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