कभी पीएम पद का दावेदार रहा ये नेता चार सीटों पर लड़ा था चुनाव, चारों हारा

राहुल गांधी के उत्तर प्रदेश के अमेठी के अलावा केरल की वायनाड सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद दो सीटों से चुनाव लड़ने के फैसलों पर सवाल उठ रहे हैं. हालांकि भारतीय लोकसभा चुनावों में दो या दो से अधिक सीटों से चुनाव लड़ने की परंपरा रही है. यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल ‌बिहारी वाजपेयी भी तीन सीटों से चुनाव लड़ने के लिए सुर्खियों में रहे हैं.

हालांकि 1996 में जन अधिनियम 1951 में संशोधन हुआ था. तब यह निश्‍चित कर दिया गया था कि कोई भी एक उम्मीदवार दो से अधिक सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकता है. क्योंकि कोई भी उम्मीदवार जीत के बाद महज एक सीट से ही लोकसभा का प्रतिनिधि बन सकता है. दूसरी सीट पर चुनाव आयोग को दोबारा चुनाव कराने होंगे.

चुनाव आयोग इसे अतिरिक्त बोझ की तरह देखता है. इसलिए चुनाव आयोग ज्यादातर किसी उम्मीदवार के दो सीटों पर चुनाव लड़ने का हिमायती नहीं रहा है. ऐसे में आइए जानते हैं कि संविधान, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का क्या है दो सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर रुख-

दो सीटों से चुनाव लड़ने पर क्या कहता है संविधान

भारतीय संविधान में जन अधिनियम 1951, धारा 33 के तहत, “भारत में होने वाले किसी भी चुनाव में कोई भी शख्स एक से अधिक सीट पर चुनाव लड़ सकता है.”

धारा 70 के तहत, “कोई भी दो सीटें जीतने वाला उम्मीदवार एक से अधिक सीट का प्रतिनिधि नहीं हो सकता. उसे हर हाल में एक सीट की दावेदारी छोड़नी होगी.”

चुनाव आयोग शुरुआती दौर से ही उम्मीदवारों के एक से अधिक सीट पर चुनाव लड़ने का विरोधी रहा है. अप्रैल 2018 में इस मामले को लेकर चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटा चुका है.

आयोग ने कोर्ट में एक हलफनामा दायर करते हुए संविधान की धारा 33 (7) में संशोधन की मांग की थी. चुनाव आयोग ने मांग की थी कि कोर्ट किसी भी उम्मीदवार के एक से अधिक सीट पर चुनाव लड़ने की छूट को खत्म करे. एक उम्मीदवार और एक लोकसभा सीट, चुनाव आयोग की इच्छा यही थी. चुनाव आयोग दो सीटों से चुनाव लड़ने को जनता के पैसों का दुरुपयोग मानता है. आयोग के हलफनामे के अनुसार इसमें सरकारी धन-बल दोनों की क्षति होती है.

चुनाव आयोग ने धारा 33 (7) में संशोधन की मांग में यह भी कहा कि किसी भी उम्मीदवार के दो सीटों पर चुनाव लड़ने और जीतने के बाद एक सीट छोड़ने की स्थिति में उस सीट पर दोबारा चुनाव का खर्च उम्मीदवार को उठाना होगा.

इसके लिए चुनाव आयोग की संस्तुति थी कि लोकसभा चुनाव में दो सीट जीतकर एक सीट छोड़ने वाले को 10 लाख रुपये और विधानसभा चुनाव में ऐसा करने वाले को 5 लाख रुपये का खर्च निर्वहन करना चाहिए. हालांकि ये सुझाव चुनाव आयोग ने 2004 में ही दे दिए थे.

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पहली बार एक सामाजिक कार्यकर्ता की ओर से दायर की गई पीआईएल के रास्ते पहुंचा. बाद में कोर्ट ने चुनाव आयोग से इस पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में संशोधन की संस्तुति को पास नहीं किया.

अटल बिहारी वाजपेयीः दो सीटों पर चुनाव लड़ने की शुरुआत पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू की. 1952 में उपचुनाव में हारने के बाद 1957 के चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी ने उत्तर प्रदेश की बलरामपुर, मथुरा और लखनऊ तीन सीटों से चुनाव लड़ा. हालांकि इसमें वह केवल बलरामपुर सीट ही जीत पाए.

जन अधिनियम 1951 में संशोधन करते हुए 1996 में यह तय कर दिया गया था कि दो से अधिक सीटों पर चुनाव नहीं लड़ा जा सकता. इससे पहले 1991 में भी अटल बिहारी वाजपेयी ने विदिशा और लखनऊ दो सीटों से चुनाव लड़ा था. 1996 में भी अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ और गांधीनगर दो सीटों से चुनाव लड़ा.

  1. इंदिरा गांधीः पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 1980 के चुनाव में यूपी की रायबरेली और मेंडक (अब तेलंगाना) सीट पर चुनाव लड़ी थीं.

2. लाल कृष्‍ण आडवाणीः साल 1991 में ही बीजेपी नेता एलके आडवाणी ने नई दिल्ली और गांधी नगर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था.

3. सोनिया गांधीः इन्होंने 1999 लोकसभा चुनाव में बेल्लारी और अमेठी से चुनाव लड़ा था.

4. लालू प्रसाद यादवः साल 2004 और 2009 में क्रमशः छपरा व मधेपुरा और सारण व पाटलीपुत्र से चुनाव लड़ा.

5. अखिलेश यादवः साल 2009 के चुनाव में अखिलेश यादव कन्नौज और फिरोजाबाद दो सीटों से मैदान में कूदे.

6. मुलायम सिंह यादवः इन्होंने 2014 के चुनाव में आजमगढ़ और मैनपुरी दो सीटों से चुनाव लड़ा था.

7. नरेंद्र मोदीः पीएम मोदी साल 2014 के चुनाव में बीजेपी के पीएम उम्मीदवार का चेहरा होते हुए भी वाराणसी और बड़ोदरा दो सीटों पर चुनाव मैदान में उतरे थे.

8. देवी लालः साल 1991 के चुनाव में तीन लोकसभा सीटों सीकर, रोहतक और फिरोजपुर से चुनाव मैदान में कूदे. उसी वक्त राज्य में चल रहे विधानसभा चुनाव में घिराई विधानसभा से भी मैदान में उतर गए थे. हालांकि वे सभी सीटों पर हार गए.

9. दक्षिण भारत के दिग्गज नेता और तेलुगू देशम पार्टी के संस्‍थापक एनटीआर साल 1985 के राज्य विधानसभा चुनाव में हिंदुपर, गुडीवडा और नलगोंडा सीट से चुनाव लड़े और सभी सीटों पर जीत दर्ज की थी .

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