मशहूर शायर आसी उल्दनी के शेर
मशहूर शायर आसी उल्दनी के शेर

आसी उल्दनी उर्दू के बहुत बड़े शायर हुए पर इन्होने मात्र 27 वर्ष की उम्र में ख़ुदकुशी कर ली थी, ऐसा कहा जाता है क्योकि इसका कोई प्रमाण नहीं मिला है. आसी उलद्नी पाकिस्तान के बहुत बड़े शायर हुए है.उनकी  शायरी युवाओं में काफी पसंद की जाती है और इनका जम कर इस्तेमाल किया जाता है.. मशहूर उर्दू शायर आसी उल्दनी की शायरी 

अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को
मैं ने औरों से सुना है कि परेशान हूँ मैं

बेताब सा फिरता है कई रोज़ से ‘आसी’

बेचारे ने फिर तुम को कहीं देख लिया है

इश्क़ पाबंद-ए-वफ़ा है न कि पाबंद-ए-रुसूम
सर झुकाने को नहीं कहते हैं सज्दा करना

जहाँ अपना क़िस्सा सुनाना पड़ा
वहीं हम को रोना रुलाना पड़ा

कहते हैं कि उम्मीद पे जीता है ज़माना
वो क्या करे जिस को कोई उम्मीद नहीं हो

मुरत्तब कर गया इक इश्क़ का क़ानून दुनिया में
वो दीवाने हैं जो मजनूँ को दीवाना बताते हैं

सब्र पर दिल को तो आमादा किया है लेकिन
होश उड़ जाते हैं अब भी तिरी आवाज़ के साथ

आता है यहां सब को बुलंदी से गिराना
वो लोग कहां हैं कि जो गिरतों को उठाएं

ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
डरते हैं ऐ ज़मीन तिरे आदमी से हम

इश्क़ कहता है कि आलम से जुदा हो जाओ
हुस्न कहता है जिधर जाओ नया आलम है?

हजारों नगमा-ए-दिलकश मुझे आते हैं ऐ बुलबुल,
मगर दुनिया ही हालत देखकर चुप हो गया हूँ मैं

वो फिर वादा मिलने का करते हैं यानी
अभी कुछ दिनों हम को जीना पड़ेगा

सब्र पर दिल को तो आमादा किया है लेकिन
होश उड़ जाते हैं अब भी तिरी आवाज़ के साथ

ख़बर नहीं है मिरे घर न आने वाले को
कि उसके क़द से तो ऊंचे हैं बाम-ओ-दर मेरे,

दर्द-ए-दिल कितना पसंद आया उसे
मैं ने जब की आह उस ने वाह की

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