मशहूर व्यंगकार हरिशंकर परसाई के बेहतरीन राजनीतिक व्यंग्य
मशहूर व्यंगकार हरिशंकर परसाई के बेहतरीन राजनीतिक व्यंग्य

बेहतर समाज के लिए सिनेमा और साहित्य दोनों ही जरूरी हैं. ये दोनों ही, समाज का वो आईना है. जिसमें जब व्यक्ति अपने आप को देखता है तो या तो वो अपने कर्मों पर गर्व करता है या फिर शर्मिंदा होकर आत्म सात करता है. व्यक्ति के जीवन में गर्व के कारण कम ही होते हैं, शर्मिंदा वो ज्यादा होता है. कहा ये भी जा सकता है कि शर्मिंदा व्यक्ति ज्यादा रचनात्मक होता है. शायद आप इस बात को न मानें, मगर जब आप इसे मशहूर व्यंगकार हरिशंकर परसाई के चश्मे से देखेंगे तो शायद ये बातें आपको सही लगेंगी.

  1. चंदा माँगनेवाले और देनेवाले एक-दूसरे के शरीर की गंध बखूबी पहचानते हैं। लेनेवाला गंध से जान लेता है कि यह देगा या नहीं। देनेवाला भी माँगनेवाले के शरीर की गंध से समझ लेता है कि यह बिना लिए टल जाएगा या नहीं।
  2. समस्याओं को इस देश में झाड़-फूँक, टोना-टोटका से हल किया जाता है। सांप्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर लिया गया – हिंदू-मुस्लिम, भाई-भाई!
  3. अश्लील पुस्तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।
  4. हरिशंकर परसाई ने देश-दुनिया का सांसारिक चरित्र अपने व्यंग्य के माध्यम से सबके सामने रखा है। इनसे बड़ा ब्यंग्यकार हिंदी साहित्य में अब तक तो सामने नहीं आया है।
  5. ‘अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ़ बैठता है तो गौरक्षा आंदोलन का नेता जूतों की दुकान खोल लेता है’.
  6. ‘एक छोटी-सी समिति की बैठक बुलाने की योजना चल रही थी. एक सज्जन थे जो समिति के सदस्य थे, पर काम कुछ करते नहीं गड़बड़ पैदा करते थे और कोरी वाहवाही चाहते. वे लंबा भाषण देते थे. वे समिति की बैठक में नहीं आवें ऐसा कुछ लोग करना चाहते थे, पर वे तो बिना बुलाए पहुंचने वाले थे. फिर यहां तो उनको निमंत्रण भेजा ही जाता, क्योंकि वे सदस्य थे. एक व्यक्ति बोला, ‘एक तरकीब है, सांप मरे न लाठी टूटे. समिति की बैठक की सूचना ‘नीचे यह लिख दिया जाए कि बैठक में बाढ़-पीड़ितों के लिए धन-संग्रह भी किया जाएगा. वे इतने उच्चकोटि के कंजूस हैं कि जहां चंदे वगैरह की आशंका होती है, वे नहीं पहुंचते.’
  7. ‘उस दिन एक कहानीकार मिले. कहने ‘लगे, ‘बिल्कुल नयी कहानी लिखी है, बिल्कुल नयी शैली, नया विचार, नयी धारा. ‘ हमने कहा ‘ क्या शीर्षक है? ” वे बोले, ‘चांद सितारे अजगर सांप बिच्छू झील.’
  8. ‘दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है. इसका प्रयोग महत्वाकांक्षी खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं. इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया था. यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है.
  9. यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उनमें उन्माद और तनाव पैदा कर दे. फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं. यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है. हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है. इसका उपयोग भी हो रहा है. आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है.’

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