Ghalib ki Awsome Shayari

MIrza Ghalib ki Awsome Shayari

1.इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया वर्ना हम भी आदमी थे काम के|

2. इशरत ए क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना|

3. इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतश ग़ालिब कि लगाए न लगे और बुझाए न बने|

4. जब तवक़्क़ो ही उठ गई ग़ालिब क्यूँ किसी का गिला करे कोई|

5. जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा, कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है|

6. जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन बैठे रहें तसव्वुर ए जानाँ किए हुए|

7. कब वो सुनता है कहानी मेरी और फिर वो भी ज़बानी मेरी|

8. कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से जफ़ाएँ कर के अपनी याद शरमा जाए है मुझ से|

9. कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग हम को जीने की भी उम्मीद नहीं|

10. की वफ़ा हम से तो ग़ैर इस को जफ़ा कहते हैं होती आई है कि अच्छों को बुरा कहते हैं|

11. बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना|

12. अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद ए क़त्ल मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूँ तेरा घर मिले|

13. आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे, ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे|

14. आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक|

15. आज हम अपनी परेशानी ए ख़ातिर उन से कहने जाते तो हैं पर देखिए क्या कहते हैं|

16. आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं उज़्र मेरे क़त्ल करने में वो अब लावेंगे क्या|

17. बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब तमाशा ए अहल ए करम देखते हैं|

18. आए है बे कसी ए इश्क़ पे रोना ग़ालिब किस के घर जाएगा सैलाब ए बला मेरे बाद|

19. बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह, जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है|

20. तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना कि ख़ुशी से मर न जाते अगर एतिबार होता|

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