उर्दू के सबसे बड़े शायर अख़्तर शीरानी के बेहतरीन शेर

उर्दू के सबसे बड़े शायर अख़्तर शीरानी के बेहतरीन शेर
उर्दू के सबसे बड़े शायर अख़्तर शीरानी के बेहतरीन शेर

अख़्तर शीरानी को उर्दू का सबसे बड़ा शायर कहा गया है। वर्ड्सवर्थ की लूसी और कीट्स की फैनी की तरह उन्होंने भी ‘सलमा’ नामक नारी का रूप देकर अमर बना दिया, जो उनके मिस्त्र वास्ती के अनुसार एक वास्तविक सुंदरी थी—जिसके प्रेम में शायर के दिल से नग्मे फूट निकले। बड़े शायर अख़्तर शीरानी 

ग़म-ए-ज़माना ने मजबूर कर दिया वर्ना
ये आरज़ू थी कि बस तेरी आरज़ू करते

आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या
क्या बताऊँ कि मेरे दिल में है अरमाँ क्या क्या

उन रस भरी आँखों में हया खेल रही है
दो ज़हर के प्यालों में क़ज़ा खेल रही है

इन्ही ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा
अँधेरी रात के पर्दे में दिन की रौशनी भी है

काँटों से दिल लगाओ जो ता-उम्र साथ दें
फूलों का क्या जो साँस की गर्मी न सह सकें

काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें
उस बेवफ़ा को भूल न जाएँ तो क्या करें

कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता
तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता

उठते नहीं हैं अब तो दुआ के लिए भी हाथ
किस दर्जा ना-उमीद हैं परवरदिगार से

कुछ इस तरह से याद आते रहे हो
कि अब भूल जाने को जी चाहता है

दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी
‘अख़्तर’ वो बे-ख़ुदी के ज़माने किधर गए

भुला बैठे हो हम को आज लेकिन ये समझ लेना
बहुत पछताओगे जिस वक़्त हम कल याद आएँगे

ख़फ़ा हैं फिर भी आ कर छेड़ जाते हैं तसव्वुर में
हमारे हाल पर कुछ मेहरबानी अब भी होती है

थक गए हम करते करते इंतिज़ार
इक क़यामत उन का आना हो गया

माना कि सब के सामने मिलने से है हिजाब
लेकिन वो ख़्वाब में भी न आएँ तो क्या करें

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