Gulzar Shayari in Hindi
Gulzar Shayari in Hindi

सम्पूर्ण सिंह कालरा उर्फ़ गुलज़ार भारतीय गीतकार,कवि, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्देशक तथा नाटककार हैं। गुलजार को हिंदी सिनेमा के लिए कई प्रसिद्ध अवार्ड्स से भी नवाजा जा चुका है। उन्हें 2004 में भारत के सर्वोच्च सम्मान पद्म भूषण से भी नवाजा जा चूका है। इसके अलावा उन्हें 2009 में डैनी बॉयल निर्देशित फिल्म स्लम्डाग मिलियनेयर मे उनके द्वारा लिखे गीत जय हो के लिये उन्हे सर्वश्रेष्ठ गीत का ऑस्कर पुरस्कार पुरस्कार मिल चुका है। इसी गीत के लिये उन्हे ग्रैमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। Gulzar Shayari in Hindi

11.
तेरी यादों के जो आखिरी थे निशान,
दिल तड़पता रहा, हम मिटाते रहे,
ख़त लिखे थे जो तुमने कभी प्यार में,
उसको पढते रहे और जलाते रहे.

2.
मचल के जब भी आँखों से छलक जाते हैं दो आँसू ,
सुना है आबशारों को बड़ी तकलीफ़ होती है|
खुदारा अब तो बुझ जाने दो इस जलती हुई लौ को ,
चरागों से मज़ारों को बड़ी तकलीफ़ होती है|
कहू क्या वो बड़ी मासूमियत से पूछ बैठे है ,
क्या सचमुच दिल के मारों को बड़ी तकलीफ़ होती है|
तुम्हारा क्या तुम्हें तो राह दे देते हैं काँटे भी ,
मगर हम खांकसारों को बड़ी तकलीफ़ होती है|

3.
चौदहवीं रात के इस चाँद तले,
सुरमई रात में साहिल के क़रीब,
दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू,
ईसा के हाथ से गिर जाए सलीब,
बुद्ध का ध्यान चटख जाए,
कसम से तुझ को बर्दाश्त न कर पाए खुदा भी,
दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू,
चौदहवीं रात के इस चाँद तले.

4.
सितारे लटके हुए हैं तागों से आस्माँ पर,
चमकती चिंगारियाँ-सी चकरा रहीं आँखों की पुतलियों में,
नज़र पे चिपके हुए हैं कुछ चिकने-चिकने से रोशनी के धब्बे,
जो पलकें मूँदूँ तो चुभने लगती हैं रोशनी की सफ़ेद किरचें,
मुझे मेरे मखमली अँधेरों की गोद में डाल दो उठाकर,
चटकती आँखों पे घुप्प अँधेरों के फाए रख दो,
यह रोशनी का उबलता लावा न अन्धा कर दे.

5.
बस एक चुप सी लगी है, नहीं उदास नहीं,
कहीं पे सांस रुकी है,
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है,
कोई अनोखी नहीं, ऐसी ज़िन्दगी लेकिन,
खूब न हो, मिली जो खूब मिली है,
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है,
सहर भी ये रात भी, दोपहर भी मिली लेकिन,
हमीने शाम चुनी, हमीने शाम चुनी है,
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है,
वो दासतां जो, हमने कही भी, हमने लिखी,
आज वो खुद से सुनी है,
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है.

6.
देखो,
आहिस्ता चलो,
और भी आहिस्ता ज़रा देखना,
सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना,
ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं.
काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में,
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो,
जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा.

7.
रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है,
रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं,
कांच का नीला सा गुम्बद है,
उड़ा जाता है,
ख़ाली-ख़ाली कोई बजरा सा बहा जाता है,
चाँद की किरणों में वो रोज़ सा रेशम भी नहीं,
चाँद की चिकनी डली है कि घुली जाती है,
और सन्नाटों की इक धूल सी उड़ी जाती है,
काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी,
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता है.

8.
खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?
एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।
डाक से आया है तो कुछ कहा होगा
“कोई वादा नहीं… लेकिन
देखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!”
या कहा हो कि… “खाली हो चुकी हूँ मैं
अब तुम्हें देने को बचा क्या है?”
सामने रख के देखते हो जब
सर पे लहराता शाख का साया
हाथ हिलाता है जाने क्यों?
कह रहा हो शायद वो…
“धूप से उठके दूर छाँव में बैठो!”
सामने रौशनी के रख के देखो तो
सूखे पानी की कुछ लकीरें बहती हैं
“इक ज़मीं दोज़ दरया, याद हो शायद
शहरे मोहनजोदरो से गुज़रता था!”
उसने भी वक्त के हवाले से
उसमें कोई इशारा रखा हो… या
उसने शायद तुम्हारा खत पाकर
सिर्फ इतना कहा कि, लाजवाब हूँ मैं!खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?
एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।
डाक से आया है तो कुछ कहा होगा
“कोई वादा नहीं… लेकिन
देखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!”
या कहा हो कि… “खाली हो चुकी हूँ मैं
अब तुम्हें देने को बचा क्या है?”
सामने रख के देखते हो जब
सर पे लहराता शाख का साया
हाथ हिलाता है जाने क्यों?
कह रहा हो शायद वो…
“धूप से उठके दूर छाँव में बैठो!”
सामने रौशनी के रख के देखो तो
सूखे पानी की कुछ लकीरें बहती हैं
“इक ज़मीं दोज़ दरया, याद हो शायद
शहरे मोहनजोदरो से गुज़रता था!”
उसने भी वक्त के हवाले से
उसमें कोई इशारा रखा हो… या
उसने शायद तुम्हारा खत पाकर
सिर्फ इतना कहा कि, लाजवाब हूँ मैं!

9.
ना दूर रहने से रिश्ते टूट जाते हैं,
ना पास रहने से जुड़ जाते हैं,
यह तो एहसास के पक्के धागे हैं,
जो याद करने से और मजबूत हो जाते हैं.

10.
मैं चुप कराता हूं हर शब उमड़ती बारिश को,
मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है.

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