एक असफल प्रेम कहानी, Hindi Story on True Love:-

                           संजीव की लाश गाँव में उसके बदहाल घर के बाहर सफेद कफन में लपेटी हुई है ,लाश के बगल में पिता जी वहीं जमीन पर सर पकड़कर गुमसुम से बैठे हैं। पुराना सा कुरता,मिट्टी से मैली हुई धोती अधपकी थोड़ी सी बढ़ी दाढ़ी, कँधे पर गंदा सा गमछा।किसान की यही पहचान होती है ।बेटे की लाश सामने देख खामोशी से आँखों से टप टप आँसू जमीन पर गिर रहे हैं। माँ ,बहन उसकी लाश से लिपटकर पूरी ताकत से चीत्कार कर रहे हैं ।उनके करुण क्रंदन से पूरा आसमान हिला जा रहा है।दृश्य ऐसा कि देखनेवाले का कलेजा फट जाए। रोते रोते फ़ीट लगने से कभी माँ बेहोश हो जाती है कभी बहन।पड़ोस की काकी बार बार माँ बेटी को संभाल रही है।
“हमर बेटवा के का हो गइल!!!! कहाँ हमरा के छोड़ के चल गईला।!!!हम केकरा भरोसे जीएम।हमार बेटवा आत्महत्या न कर सकेला ,जरूर कौनो मार दिहिस होगा ” माँ बिन पानी के मछली जैसी छटपटा रही थी, आँसू रुक ही न रहे थे ।” बहन का हल बुरा था ।

Hindi Story on True Love

” हम केकरा राखी बाँधम भइया !!!हमार उठ जा राजा भइया। हम किरिया खाके कहा तानि कुछो न मंगब तोरा से।हमरा कुछो न चाही तोरा सिवा!!बस तू उठ रह भइया रे हमार भइया रे !!बहन भी बदहवास थी आँखों से लोर और नाक मुँह से लार लगातार बह रहे थे।माँ बहन का पूरा शरीर मिट्टी और पसीने से लथपथ था। माँ बेटी का धूल से सना मुरझाया चेहरा शून्य होती आँखे, कंकाल की तरह शरीर दोनों संजीव की लाश पर सर पटक पटक कर रोते हुए किस्मत और भगवान को कोस रहीं थीं।पूरी ज़िंदगी अभावों से झेलते हुए इस परिवार को संजीव पर ही भरोसा था कि वही पढ़ लिख कर कुछ बनकर परिवार को दुर्दिन से बाहर निकालेगा।

 

नहीं माँ !!!नही!! मत रो!! मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। अचानक संजीव की आँखे खुल गयी ।
जोर से चिल्लाता हुआ संजीव अपने बिस्तर से बदहवास सा उठ बैठा। बहुत ही डरावना सपना देखा था उसने।ठंढ के दिनों में भी पूरा शरीर पसीने पसीने था।कमरे में अकेला था वो ।किसी टूटे हुए आशिक़ की तरह शक्ल बना रखी थी उसने।बिखरे बाल बढ़ी दाढ़ी अस्त व्यस्त कपड़े।पूरे कमरे की हालत बहुत बुरी थी।
कमरे को देखकर लग रहा था जैसे कई दिनों से सफाई नहीं हुई हो।संजीव ने उठकर घड़ी देखी दस बजने को आये।अब तो शिल्पी की बारात भी आ गयी होगी ,जयमाल भी हो गया होगा सोचते सोचते उसकी नज़र टेबल पर रखी सल्फास की गोलियों को पर पड़ी तो पूरे शरीर में सिरहन सी दौड़ गई उसे अभी अभी देखा अपना भयानक सपना याद आने लगा।वह क्या करने जा रहा था सपने की याद आते ही वो काँप उठा।
एक महीने पहले जब उसने शिल्पी की शादी की खबर सुनी तब से वह टूट गया था।संजीव और शिल्पी एक दूसरे से दो वर्षों से बहुत प्यार करते थे।संजीव गाँव से शहर आकर रेलवे या बैंक के तृतीय श्रेणी के पद की नौकरी के लिए तैयारी कर रहा था।
एक कोचिंग में साथ पढ़ने के दौरान मद्यमवर्गीय परिवार की शिल्पी से उसकी दोस्ती हुई और फिर उनदोनों की दोस्ती प्यार में बदल गयी।

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पटना के महेंद्रू में दोनों कोचिंग के बाद गँगा तट पर बैठकर घंटो गँगा की लहरों को निहारते। शिल्पी का सर संजीव के कंधों पर होता और दोनों अपने भविष्य को लेकर हजारों ख्वाब बुनते।
बिहार राज्य के नालंदा जिले के एक छोटे से गाँव से संजीव पटना में पढ़ाई करने आया था ।एकलौते बेटे संजीव से माँ बाप और छोटी बहन को बहुत उम्मीदें थीं।पिता छोटे किसान थे किसी तरह घर गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी।पेट काटकर ओस आशा के साथ वो कुछ पैसे हर महीने संजीव को भेज देते थे कि अंत में नौकरी लगने के बाद संजीव उनके सपनों को पूरा करेगा।
संजीव शुरू में अपनी जिम्मेदारी समझते हुए बहुत मेहनत से पढ़ाई करने लगा ।जिस तरह से वो परीक्षा की तैयारी कर रहा था उसके साथ पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले सभी को उम्मीदें थीं कि जल्दी ही किसी न किसी परीक्षा में सफल होकर नौकरी को प्राप्त कर लेगा।लेकिन इसी बीच शिल्पी के प्यार के चक्कर में वो पढ़ाई में पिछड़ने लगा।एक महीने से शिल्पी की शादी की बात सुनकर वो बेहद परेशान था।

उसने शिल्पी से काफी आग्रह किया कि छः महीने तक “शादी न करे वो किसी न किसी परीक्षा में सफल होकर नौकरी प्राप्त कर उसी के साथ जरूर विवाह करेगा “पर शिल्पी ने बहुत मायूस होते हुए कहा “जितने दिन तक मुझसे संभव हो सका मैंने अपनी शादी के लिए रोक रखी अब घरवालों को रोकना मुश्किल है।”
दिल टूटने के कारण संजीव की हालत अर्धविक्षिप्त ही हो गयी थी वो निराशा के भवरों में डूबने लगा था।दिन में भी कमरे में अंधेरा कर पड़ा रहता ।किसी से मिलना जुलना और बात करना बहुत ही कम कर दिया था ।बाल दाढ़ी बेतरतीब बढ़ चुके थे।खुद भी पूरी तरह अस्त व्यस्त हो गया था और कमरा भी।उसे अपने प्यार को खोने का बहुत अफसोस था।

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आज शिल्पी की शादी थी और संजीव ने आज आत्महत्या करने का अंतिम फैसला ले लिया था। सल्फास की गोलियाँ लाकर रख दी थी।दो दिन से एकदम बदहवास सा हो गया था जैसे जैसी शिल्पी की शादी का समय करीब आ रहा था उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी।दो दिन से एक मिनट के लिए भी सोया न था आँखे खोलकर वो पता नहीं क्या क्या सोचता रहता।
शिल्पी के बिना जीवन बेकार है अब मुझे आत्महत्या कर लेनी ही होगी सोचते सोचते पता नहीं अचानक उसे कैसे नींद आ गयी और उसने एक भयानक सपना देखा।
इतने भयानक सपने देखकर वह ठंड में भी पसीने पसीने हो गया ।सोचने लगा ये मैं क्या करने जा रहा था।सपने में माता पिता और बहन के हालात देखने के बाद उसने आत्महत्या का विचार तुरंत त्याग दिया।

संजीव ने डायरी निकाली और लिखा “किसी एक का साथ छूट जाने से ज़िंदगी ख़त्म नहीं हो जाती और मुझे अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी प्यार हासिल न हुआ तो न सही पर आत्महत्या कर मुझसे बहुत उम्मीदें लगाए और मुझे बहुत प्यार करनेवाले अपने परिवार को बर्बाद होने नहीं दूँगा ” लिखकर वो एक नई ऊर्जा के साथ फिर से पढ़ाई की तैयारी करने लगा अब संजीव के चेहरे पर दृढ़ निश्चय के भाव थे और मन में नया आत्मविश्वास…….. संजीव

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