लोकसभा चुनाव 2019 के पहले चरण का चुनाव प्रचार आज थम गया। इस दौर में 91 सीटों पर वोटिंग होनी है। इस दौर में 18 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव होने हैं। आइए जानते हैं कि इस चरण में 18 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों के मतदाता किन-किन वीवीआईपी कैंडिडेट्स की किस्मत का फैसला करने वाले हैं। पहले चरण की 91 में से अभी 32 बीजेपी, 7 कांग्रेस, 11 टीआरएस और 16 सीटें टीडीपी के पास हैं।

1.नितिन गडकरी- नागपुर

पहले चरण में जिन वीवीआईपी का राजनीतिक भाग्य तय होना है, उसमें मोदी कैबिनेट के बड़े नाम नितिन गडकरी भी शामिल हैं। महाराष्ट्र की नागपुर लोकसभा सीट पर इसबार उनके मुकाबले कांग्रेस ने नाना पटोले को टिकट दिया है। पिछली बार गडकरी 3 लाख से ज्यादा वोटों से जीते थे और इसबार उन्हें अपने काम के दम पर 5 लाख से ज्यादा वोट से जीत का भरोसा है। नागपुर में आरएसएस का हेडक्वार्टर है और गडकरी का संघ से बहुत पुराना नाता है। ऐसे में कुनबी समाज से आने वाले नाना पटोले उन्हें कितनी कड़ी टक्कर दे पाते हैं, यह देखने वाली बात है।

2.जनरल वी के सिंह बनाम डॉली शर्मा बनाम सुरेश बंसल- गाजियाबाद

यूपी की गाजियाबाद सीट भी वीवीआईपी सीट है। पिछली बार यहां से केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह 5 लाख से ज्यादा मतों से जीते थे। 2014 में वे सबसे ज्यादा वोट से जीतने वाले प्रत्याशी भी रहे। इस बार उन्हें सपा-बसपा और आरएलडी गठबंधन के उम्मीदवार सुरेश बंसल से बहुत कड़ी टक्कर मिलने की संभावना है। हालांकि, वीके सिंह अपने और मोदी सरकार के काम के दम पर दोबारा जीतने का दम भर रहे हैं। वहीं कांग्रेस की उम्मीदवार डॉली शर्मा ने यहां के चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है, जिनके पक्ष में प्रियंका गांधी वाड्रा गाजियाबाद में रोड शो भी करके गई हैं।

3. अजीत सिंह बनाम संजीव बालियान- मुजफ्फरनगर

आरएलडी के संस्थापक चौधरी अजीत सिंह इस बार अपनी परंपरागत बागपत सीट छोड़कर मुजफ्फरनगर में किस्मत आजमा रहे हैं। यहां उनका मुकाबला बीजेपी के मौजूदा सांसद संजीव बालियान से है। हालांकि, महागठबंधन के उम्मीदवार होने के चलते इसबार अजित सिंह का पलड़ा भारी दिखता है। उनका जाट समुदाय पर बहुत ज्यादा दबदबा है और उन्हें मुसलमान और जाटव मतदाताओं का भी समर्थन मिलने की उम्मीद है। वैसे पिछले चुनाव में वो मोदी लहर के कारण हार गए थे। गन्ना किसानों की नाराजगी के चलते भी इसबार बालियान का रास्ता कठिन लग रहा है। हालांकि, राज्यनीतिक ध्रुवीकरण के लिए चर्चित यह सीट आखिरी वक्त में क्या गुल खिलाएगी कहना मुश्किल है?

4.सत्यपाल सिंह बनाम जयंत चौधरी- बागपत

पश्चिमी यूपी की बागपत सीट का मुकाबला इसबार भी दिलचस्प लग रहा है। 2014 में पूर्व पुलिस अधिकारी सत्यपाल सिंह ने यहां जाटों के नेता माने जाने वाले अजीत सिंह को हरा दिया था। लेकिन, इस बार समीकरण बदल चुके हैं और अजीत सिंह के बेटे और आरएलडी उपाध्यक्ष जयंत चौधरी उनके मुकाबले महागठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। सत्यपाल सिंह को भरोसा है कि ऊंची जातियों और जाटों के एक बड़े हिस्से के समर्थन एवं मोदी सरकार के पांच साल के काम की बदौलत वे छोटे चौधरी को भी हरा देंगे। लेकिन, जाट, जाटव और मुसलमानों की जुगलबंदी से उनका खेल बिगड़ भी सकता है। हालांकि, जयंत के लिए छिटके जाट मतों को फिर से अपने पक्ष में करना और जाटों के साथ जाट और मुस्लिम वोट को भी जोड़ लेना एक बहुत बड़ी कठिन चुनौती साबित हो सकती है।

5.महेश शर्मा बनाम सतवीर नागर- गौतमबुद्ध नगर

एक और केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा एक बार फिर से यूपी के गौतमबुद्ध नगर सीट से अपना चुनावी किस्मत आजमा रहे हैं। यहां मुख्य मुकाबला शर्मा और बसपा के सतवीर नागर के बीच ही लग रहा है। लेकिन, कांग्रेस के अरविंद कुमार सिंह की उपस्थिति ने इसे त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बना दिया है। महेश शर्मा को मोदी सरकार के विकास कार्यों और जेवर में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा को मंजूरी दिलाने जैसे कार्यों के दम पर दोबारा जीत का भरोसा है। लेकिन सतवीर नागर को उम्मीद है कि माया का आशीर्वाद, अखिलेश का साथ और मुसलमानों का समर्थन उनकी जीत पक्की कर सकता है। अलबत्ता कांग्रेस उम्मीदवार उनकी राह जरूर मुश्किल करते दिख रहे हैं, जिनके बाहरी होने को भी चुनाव में मुद्दा बनाया जा रहा है।

6.असदुद्दीन ओवैसी- हैदराबाद

एआईएआईएम (AIMIM) नेता असदुद्दीन ओवैसी लगातार तीन बार से हैदराबाद से चुनाव जीत रहे हैं। अपने तीखे बयानों के चलते वे देश भर के मुसलमानों के मसीहा बन चुके हैं। जाहिर है कि हैदराबाद जैसी सीट पर इस बार भी उनकी स्थिति बाकी उम्मीदवारों से बहुत मजबूत है। ओवैसी के मतदाताओं को लगता है कि अगर उनकी पार्टी देश के दूसरे इलाकों में भी जीत दर्ज करना शुरू कर दे, तो वे भारतीय राजनीति में अपना एक खास मकाम बना सकते हैं। एक बात गौर करने लायक है कि हैदराबाद सीट पर अबतक जो 16 चुनाव हुए हैं उनमें से 8 दफे एआईएआईएम (AIMIM) की ही जीत हुई है।

7.जीतनराम मांझी- गया

11 अप्रैल को बिहार में गया के मतदाता पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी का भी सियासी भाग्य तय करेंगे। यह एक सुरक्षित सीट है और मांझी महादलित समुदाय के नेता माने जाते है। उनकी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (HAM) का बिहार में आरजेडी, कांग्रेस और वीआईपी (VIP) के साथ गठबंधन है। गया सीट पर उनका मुकाबला जेडीयू (NDA) के उम्मीदवार विजय मांझी से है। हालांकि, पिछले चुनाव में मांझी जेडीयू के साथ थे और उन्हें सिर्फ 1,31,828 वोट ही मिले थे और वे तीसरे नंबर पर रहे थे। पिछले चुनाव में इस सीट पर बीजेपी के हरी मांझी ने जीत दर्ज की थी, लेकिन सीटों के तालमेल में यहां से इसबार जेडीयू लड़ रही है।

8. हाजी याकूब कुरैशी बनाम राजेंद्र अग्रवाल- मेरठ

यूपी के मेरठ में बीजेपी ने इसबार भी अपने मौजूदा सांसद राजेंद्र अग्रवाल पर ही भरोसा किया है। उनका मुकाबला मुख्य रूप से महागठबंधन के उम्मीदवार हाजी याकूब कुरैशी से हो रहा है। हालांकि, कांग्रेस ने यहां से पूर्व मुख्यमंत्री बाबू बनारसी दास के बेटे हरेंद्र अग्रवाल को टिकट देकर लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है। उनके वैश्य समाज से होने के कारण भाजपा के सवर्ण वोट में बंटवारे की आशंका है, जिससे कुरैशी की स्थिति और बेहतर हो सकती है। वैसे यहां भी अगर महागठबंधन के पक्ष में दलित-मुस्लिम वोटों की जुगलबंदी हो गई तो सारे समीकरण धरे के धरे रह सकते हैं।

9.कुंवर भारतेंदु सिंह बनाम नसीमुद्दीन सिद्दीकी बनाम मलूक नागर- बिजनौर

यूपी की बिजनौर लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने इस बार बसपा के पुराने दिग्गज नसीमुद्दन सिद्दीकी को टिकट देकर महागठबंधन के लिए परेशानी खड़ी कर दी है। यहां मलूक नागर बीएसपी के टिकट पर महागठबंधन के प्रत्याशी हैं, जिनका मुकाबला बीजेपी के मौजूदा सांसद कुंवर भारतेंदु सिंह से है। बीजेपी के प्रत्याशी के सामने कई चुनौतियां हैं, वे महागठबंधन के उम्मीदवार से तो जूझ ही रहे हैं, भाजपा कार्यकर्ताओं में भी उनके नाम पर नाराजगी रही है। जबकि मलूक नागर गुर्जर हैं और यहां इस समुदाय का वोट निर्णायक भूमिका में है। ऊपर से दलित-मुस्लिम गठजोड़ उनका पलड़ा और भी भारी कर रहा है।

10. चिराग पासवान- जमुई

बिहार में रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान की जमुई सीट पर भी गुरुवार को ही मतदान होना है। अभिनेता से नेता बने लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) नेता 2014 में भी यहीं से जीते थे, जो कि एक सुरक्षित सीट है। 2014 में वो यहां से करीब 80 हजार वोटों से जीते थे और इसबार उनके सामने आरएलएसपी (RLSP) के उम्मीदवार भूदेव चौधरी हैं। गौरतलब है कि पिछली बार आरएलएसपी (RLSP) एनडीए (NDA) का हिस्सा थी, लेकिन अब आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा है। ऐसी स्थिति में रामविलास के चिराग के लिए इसबार का मुकाबला थोड़ा ज्यादा कड़ा लग रहा है।

11.हाजी फजलुर्रहमान बनाम राघवलखन पाल बनाम इमरान मसूद -सहारनपुर

यूपी के सहारनपुर में इसबार भाजपा के राघवलखन पाल का मुकाबला बसपा के हाजी फजलुर्रहमान से हो रहा है, लेकिन कांग्रेस ने इमरान मसूद को टिकट देकर यहां की लड़ाई को कठिन बना दिया है। एयर स्ट्राइक के बाद भाजपा के पक्ष में बने माहौल और सवर्ण मतदाओं में अच्छी पैठ के चलते राघवलखन पाल मजबूती से चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। वहीं, कांग्रेस के इमरान मसूद 2014 के बाद से ही लगातार क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले चुनाव के बाद काजी परिवार का एक होना भी इमरान मसूद को मुस्लिम वोटों का फायदा दिला सकता है। इस सीट पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में है। इसके अलावा भीम आर्मी से जुड़ाव के चलते दलित वोट भी इमरान को मिल सकते हैं। लेकिन, महागठबंधन ने यहां के देवबंद से साझा रैली की शुरुआत करके हाजी फजलुर्रहमान के पक्ष में जोरदार हवा बनाने की कोशिश की है। कुल मिलाकर यहां बीजेपी की जीत तभी हो सकती है जब मसूद और हाजी में मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो जाय, जो कि यहां 6 लाख के करीब हैं।

12.प्रदीप चौधरी बनाम तबस्सुम हसन बनाम हरेंद्र मलिक- कैराना

यूपी की कैराना सीट पर इसबार देश भर की नजरें रहेंगी। यहां 2018 में उपचुनाव में बीजेपी की हार ने ही महागठबंधन बनाने का रास्ता दिखाया था। तब आरएलडी उम्मीदवार के तौर पर तबस्सुम हसन ने सपा-बसपा और कांग्रेस के समर्थन से भाजपा उम्मीदवार मृगांका सिंह को हरा दिया था। यह सीट बीजेपी के उम्मीदवार के निधन से खाली हुई थी। गठबंधन के तहत इस बार यह सीट सपा के खाते में है, लेकिन उसने उम्मीदवार तमस्सुम हसन को ही बनाया है। भाजपा ने यहां पिछली बार की उम्मीदवार मृगांका सिंह का टिकट काटकर गंगोह के विधायक प्रदीप चौधरी को मैदान में उतारा है। मृगांका सिंह का टिकट कटने से यहां उनके समर्थकों में भाजपा के उम्मीदवार के प्रति नाराजगी है। जबकि, कांग्रेस ने कैराना सीट पर पश्चिमी यूपी के कद्दावर जाट नेता हरेंद्र मलिक को टिकट दिया है। सियासी जानकारों का मानना है कि भाजपा और कांग्रेस की तरफ से दो बड़े गुर्जर और जाट उम्मीदवारों को उतारने से इन दोनों समुदायों के वोटों में बंटवारा हो सकता है। वहीं सपा-बसपा और आरएलडी के गठबंधन की वजह से तबस्सुम हसन के खाते में दलित-मुस्लिम वोटों के साथ-साथ जाट वोट भी जा सकते हैं।

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