Lachit Borphukan (लाचित)- ऐसा वीर जिसकी दहाड़ से औरंगजेब पेशाब कर देता था

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Lachit Borphukan (लाचित)- ऐसा वीर जिसकी दहाड़ से औरंगजेब पेशाब कर देता था:-

 

                        हर साल 24 नवंबर को असम में  इस वीर की बहादुरी का उत्सव व् जन्मदिन  मानाया जाता है, लचित के नाम पर ही राष्ट्रिय सुरक्षा विभाग में बेस्ट कैडेट पुरूस्कार गोल्ड मेडल दिया जाता है या NDA में जो बेस्ट कैडेट होता है, उसको एक स्वर्ण पदक से नवाज़ा जाता है वह लचित अवार्ड के नाम से ही जाना जाता है !

Lachit Borphukan लाचित बोरफुकन

यह वह नायक है जिसने भारत वर्ष पर कब्ज़ा करने और इश्लाम फैलाने के इरादे से आये मुगल आक्रमणकारी लूटेरे औरंगज़ेब और उसकी सेना को असम पर पांव तक नहीं रखने दिया । आज हम बताते है इतिहास में कैसे सूरमा लचित बरफूकन ने मुगलों को धूल चटाई थी.

 

हमारे इतिहास के किताबों में  हमें अहॊम राजाओं की वीर गाथा के बारे में कभी नहीं पढ़ाया गया है। जो मुगल साम्राज्य पेशावर से बंगाल और दक्खन तक फैली हुई थी, वो असम के दरवाज़े पर आकर घुटने ठेक देती थी। अहॊम राजा अपने पराक्रम के लिए जाने जाते हैं। अहॊम साम्राज्य के सेना में सन 1622 में एक महानायक हुआ था,  जिसका नाम था लाचित बरफूकन। लचित एक अप्रतिम यॊद्धा थे और सेनापती भी।

यहां एकबात ओर साफ कर दें कि बोरफुकन, लाचित का नाम नहीं बल्कि उनकी पदवी थी।

शुरुआत से शुरू करते हैं :

लचित का जन्म 24 नवंबर  सन 1622 सेंग-लॉन्ग मोंग(जगह ), चराइडो – असम में एक पुजारी (लाचित सेंग कालुक या मोसाई) के घर हुआ था, वह अपने पिता के चौथे बेटे थे! उनके पिता जो कि असम राजा प्रतापध्वज सिंह के शासन-काल में पहले बोड़बरुआ (सेनानायक ) थे !!राजा प्रतापध्वज सिंह के बाद में उनके पुत्र जयध्वज सिंह राजा बने लेकिन एक युद्ध में  मुगलों (मीर जुमला व् दलेर खान) से उन्हें गुवाहटी का किला और बहुत कुछ हारना पढ़ा जिसके चलते एक अपमान जनक संधि हुयी ! संधि में मुग़ल सेनाप्रमुख मीर जुमला (जो उस वक्त बंगाल का सेनापति था) और दलेर खान ने घोड़े, सोना, चांदी हाथी 90% तक ले लिया ! यहाँ तक तो वह (जयध्वज सिंह ) प्रजा के खून खराबे की बजह से सह गये मगर दलेर खान वहसी दानव जैसा था उसने राज्य की सारी कुवारी लड़कियों को हरम (वह जगह जहाँ इस्लामिक रीतिरिवाज से डांस और rape किया जाता है) में डालने को कहा जो किसी को स्वीकार्य न था, फिरभी वह नहीं माना उसने कत्लेआम किया और राजा जयध्वज सिंह की 6 साल की बेटी को भी नहीं छोड़ा और हरम में डाल दिया, जिससे सबका खून खौल गया !!  राजा जयध्वज सिंह यह पराजय और अपमान सह नहीं पाए और उनकी शोक के कारण जल्द म्रत्यु हो गयी !! इस वक्त लचित के पिता राज्य सचिव थे !! 

 

वहीँ से उन्हें सफल युद्ध कौशल व् राजनितिक रणनीति का ज्ञान हुआ साथ में उन्होंने मानविकी, शास्त्र, भौतिक शास्त्र और सैन्य कौशल की शिक्षा प्राप्त की थी। शुरुआत में उन्हें अहोम स्वर्गदेव के ध्वज वाहक का पद सौंपा गया था, जो कि किसी महत्वाकांक्षी कूटनीतिज्ञ या राजनेता के लिए उस वक्त पहला महत्वपूर्ण कदम माना जाता था।

Lachit Borphukan (लाचित)

फुकन पदवी असमिया भाषा में निम्नप्रकार दी जाती थी :

  • जो 10 सैनिक का मुखिया वह =Deka  (डेका )
  • जो 20 सैनिक का मुखिया वह =Bora (बोहरा)
  • जो 100 सैनिक का मुखिया वह =Saikiya (सेकिया)
  • जो 1000 सैनिक का मुखिया वह = Hazarika(हजारिका)
  • जो 3000 सैनिक का मुखिया वह = Raajkova (राजकोवा )
  • जो 6000 सैनिक का मुखिया वह = Fukan (फुकन )
  • और जो इन सबका मुखिया, वह होता था  बोड़फुकन .!

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इनमे जो 10 सैनिक थे वह सबसे निपुड होते थे बाकी उनसे कम और काबिलियत के हिसाब से वैसे ग्रुप में उन्हें रखा जाता था !! निम्न चित्र में देख सकते है :-

तो ऐसे दी जाती थी बोड़फुकन की पदवी !!

यहाँ एक बात और बताने योग्य है की जयध्वज सिंह के 3 बेटे थे मगर वह एक को सिंहासन देना चाहते थे दूसरों को सेनापति बनाना, मगर उनके बेटों ने मंत्री बनना चाहा और म्रत्यु उपरांत  उनके बड़े बेटे चक्रध्वज सिह गद्दी पर बैठे मगर राजा के सामने प्रश्न यह था कि बोरफुकन कौन बनेगा ?

Lachit Borphukan लाचित बोरफुकन

raaja chakradwaj Capture-min सारे घाट-min, Lachit Borphukan (लाचित) indiandiary battleबोड़फुकन (पदवी) के रूप में अपनी नियुक्ति से पहले लाचित, चक्रध्वज सिह की शाही घुड़साल के अधीक्षक, रणनैतिक रूप से महत्वपूर्ण सिमुलगढ़ (वर्तमान गुहाटी के निकट ) किले के प्रमुख और शाही घुड़सवार रक्षक दल के अधीक्षक के पदों पर आसीन रहे थे।  इसलिए बिना किसी रोक टोक के उनको सेना प्रमुख चुन लिया गया !!

और यहाँ से शुरू होती है लचित की कहानी, लचित को मुगलों की दसिता कतई बर्दास्त नहीं थी.   राजा चक्रध्वज सिह द्वारा चुने जाने के बाद सबसे बड़ा काम  था अपना खोया हुआ सम्मान राजधानी गुवाहटी और अपने किले सब बापस लेंना !!

सबसे बड़ी चुनौती थी 70 हज़ार की मुग़ल सेना, लूट के बाद मीर जुमला बंगाल बापस चला आया और अपने सिपाह सलार सहिस्ता खान को दलेर खान के साथ असम छोड़ दिया !! वहीँ दूसरी तरफ उनकी(बोड़फुकन ) एकदम निराश सेना जिसने बेईज्ज़ती सही जिल्लत सही, जिसके राजा मारे गये !!

अगले 4 सालों तक लचित ने अपना सारा ध्यान सेना के गठन और हथियार बनाने में लगाया !! नए सैनिकों की भरती की बड़े पैमाने पर, तोपें बन्बायें और तांबा सहित कई मिक्स धातु की तलवारें जो टूटें न चाहे मुड जायें !!

Lachit Borphukan लाचित बोरफुकन

गंगा की तरह ही लचित ब्रह्मपुत्र नदी को अपनी माँ सामान मानते थे और वह ब्रह्मपुत्र को मुगलों के हाथ में नहीं देख सकते थे जो सिर्फ गंदगी फैलाते थे !! इसलिए एक बड़ी नौसेना तैयार की, कई प्रकार की नावें बनाई जो छोटी हल्की व् तेज़ थीं और एक बड़ा जासूसों का जाल बनाया गया !

सबसे कमाल की बात यह थी, 4 साल में इन सब तैयारियों की मुगलों को भनक तक नहीं लगने दी ! क्योंकि साथ में दोस्ती का दिखावा चलता रहा !!

सन 1667 में औरंगजेब ने गुवाहटी का फौजदार फ़िरोज़ खान को बनाया…!!

फ़िरोज़ खान और बड़ा ऐयाश था उसने चक्रध्वज सिह को सीधे सीधे असमियाँ लड़कियों को अपने पास भेजने का फरमान दे डाला, इस बात ने आग में घी डालने का काम किया !!

 

अगले दिन सेनापति बाग़ हजारिका के नेत्रत्व में लचित के 10 सैनिक गुवाहटी किले (जोकि मुगलों के कब्जे में था) पीछे से चढ़ गये और उनके तोपों में पानी डाल दिया !! और 2 सैनिकों ने चुपके से उनके सैनिक को मार कर तोपखाने में आपना ताला लगा दिया !!

सुबह होते ही लचित ने 5 बजे किले पर आक्रमण कर दिया जिसमे फ़िरोज़ खान मारा गया और किले सहित गुवाहटी को मुगलों से आज़ाद करा लिया !!

हरम चलाने और राजा की 6 वर्ष की पुत्री को छीनने के कारण लचित किसी भी मुग़ल सैनिक को जिन्दा न छोड़ने का आर्डर दिया और सबको चुन कर काट डाला, जो भारतीय मुग़ल सैनिकों में शामिल थे उनको भी नहीं छोड़ा और सबका ब्रह्मपुत्र में श्राद्ध किया!

इसी दौरान एक घटना और हुयी लचित के सगे मामा ने लापरवाही की और मुग़ल सैनिक को जीवन दान दिया जबकि लचित के एक सैनिक ने इस बात का बिरोध किया तो उस मुघल सैनिक ने उस लचित के सैनिक से झगड़ा कर लिया ! यह बात जब लचित को पता लगी तो लाचित बोड़फुकन ने उस मुग़ल सैनिक के साथ अपने सगे मामा का सर एक साथ धड से उड़ा डाला! कहा चाचा, मामा, ताऊ देश से बड़े नहीं होते और घोषणा की मेरे किसी भी सैनिक या व्यक्ति का अपमान मेरा अपमान है जो मै हरगिज़ नहीं सहूंगा, इस घटना ने लचित को अपने ही सैनिकों की नजरों में बहुत उपर उठा दिया और उन्हें यकीं हो गया कि मुगलों को हराना नामुमकिन नहीं है !! इसके साथ गुवाहटी ने फिरसे आज़ाद साँस ली !!

असली कहानी अब शुरू हुयी …. दिल्ली बैठा औरंगजेब ने जब यह सब सुना तो गुस्से से लाल हो गया क्योंकि मराठा (शिवाजी ) ही उसका सबसे बड़ा सरदर्द बने हुए थे तो असम को कब्जाने का सपना टूटना  और ऐसे उसके सैनिकों को काट देना उससे सहा नहीं गया !!

उसने मिर्ज़ा राजा राम सिंह को 70हज़ार की सेना के साथ दलेर सिंह का साथ देने भेजा, यहाँ सिखों के 9वें गुरु तेग बहादुर भी राम सिंह के साथ आये थे मगर जब उन्होंने लचित की देश  भक्ति   के बारे में सुना तो वह पीछे हठ  गये !

Lachit Borphukan लाचित बोरफुकन

लचित को मालूम था की औरंगजेब जरुर पलटवार करेगा तो उन्होंने सारे किले सुरक्षित किये तथा ब्रह्मपुत्र पार न करने देने का और उसको हराने का प्लान बनाया !!

इसी दौरान १६७० में राजा चक्रध्वज सिह का निधन हो गया और उनके बेटे उदयादित्य सिंह राजा बने !!

राम सिंह इतनी विशाल मुग़ल सेना लेकर भी सफल नहीं हो पा रहा था तो औरंगजेब ने 40 बड़ी नाव बन्बायें और ब्रह्मपुत्र में ही युद्ध करने का आदेश दिया !! इसी के साथ 1671 में सरायघाट या सराईघाटी की लड़ाई शुरू हुयी !!

सरायघाट का भीषण युद्ध:

औरंगज़ेब ने 4000 महाकौशल लड़ाके, 30000 पैदल सेना, 21 राजपूत सेनापतियों का दल, 18000 घुड़सवार सैनिक, 2000 धनुषधारी सैनिक की विशाल सेना असम पर आक्रमण करने के लिए भेजी थी.

सराईघाटी का युद्ध ठीक बैसा ही था जैसा हल्दीघाटी में अकबर ने लड़ा था और फिर भी महाराणा प्रताप को अकबर कभी हरा नहीं पाया था !! यह इस घटना का आखिरी पड़ाव भी था जो आठ साल पहले मीरजुमला और दलेर खान की लूट से शुरू हुआ था !! यह भारतवर्ष की बहुत अनोखी लड़ाई थी  क्योंकि यह युद्ध पूर्णतया विशालकाय ब्रह्मपुत्र  नदी में लड़ा गया था यह युद्ध 1671 मार्च में शुरू हुआ था !

जैसा की इस चित्र में है : कामख्या मंदिर, अस्वक्लान्ता मंदिर और इताकुलि किले से लचित की सेना का सञ्चालन हुआ !!

सारे घाट-min, Lachit Borphukan (लाचित) indiandiary battleशुरू के २  दिन इनकी रणनीति फ़ैल होती रही क्योंकि मुग़ल सेना विशाल थी तीसरे दिन जब लचित के सैनिक पीछे हटने लगे और तोपों से बचाव में लग गये तो लचित को गुस्सा आया उसने कहा “तुमको भागना है भाग जाओ, मरना है मर जाओ मगर मै युद्ध करूँगा और अपने जीते जी मुग़ल मेरे असम की एक बच्ची को हाथ नहीं लगा पायेंगे, यह सुन वह अकेला आगे बढ़ा और अकेले  मुगलों के 3 जहाज़ उड़ा दिए !! यह सब देख सैनिकों में जोश आ गया सब चिल्लाये बताओ महाराज हम क्या करे… ??

उसने कहा मौका मत दो संभलने का … छोटी नावों को आगे लाकर एक साथ पुल बनाओ और आगे मत बदने दो !!

Lachit Borphukan लाचित बोरफुकन

जबतक मुग़ल धुएं से बहार आते इधर सब तोपें तैयार थी और वहाब के साथ छोटी नावों को तेज़ चलाकर लचित के सैनिक उनके आगे निकल गये क्योंकि इनकी लचित की नाव बहुत छोटी व् तेज़ थी तथा छोटे तोपें भी थी!! सामने से तीन नावों ने मुगल सेना के सेनाप्रमुख मुनब्बर खान को घेर लिया और तोपों से उड़ा डाला !! यह देखते ही मुगल सेना में खलबली मच गयी!!

दिन के अंत तक दलेर खान सहित उनके तीन सेना प्रमुख और 1400 सिपाहियों को उड़ा डाला … चूँकि मुगल सेना पानी में निपुड नहीं थी तो पूरी तरह बर्बाद होकर भागे !! जो जंगल में छिपे उन्हें खोज-खोज कर मारा,,,, !!

हालाँकि लचित युद्ध के वक्त ही बीमार पढ़ गये थे तो राजा ने युद्ध टालने को कहा तब लचित ने कहा था कि  “जब मेरा देश, मेरा राज्य आक्रांताओं द्वारा कब्ज़ा किए जाने के खतरे से डर रहा है, जब हमारी संस्कृति, मान और सम्मान खतरे में हैं, तो मैं बीमार होकर भी आराम कैसे करू  ? मैं युद्ध भूमि से लाचार होकर घर कैसे जा सकता हूँ ? हे राजा युद्ध की आज्ञा दें।”!!

  राम सिंह भी बाद में अपनी जान नहीं बचा पाया इस हार से तिलमिला कर औरंगजेब ने राम सिंह को दीवार में चुनवा दिया और डर की बजह से कभी ब्रह्मपुत्र में कदम नहीं रखा ! सेकुलरों का यही हाल होगा जो जयचंद और उसकी बच्चियों का हुआ था !!

इस जीत ने जो आधारशिला रखी उसकी बदौलत किसी मुग़ल ने आँख उठाकर नहीं देखा !  आगे आने वाले राजाओ जैसे रूद्रध्वज सिंह ने अनेक मंदिर बनाये सांकृतिक विकास किया, मुगल जीत शायद अपने साथ सांस्कृतिक  सर्वनाश और गुलामी लाती !! अफ़सोस 1671 में ही इस युद्ध के कुछ दिन बाद वह चल बसे !!

दुर्भाग्य की बात यह है कि आज इस वीर योद्धा का नाम भारत के कुछ प्रतिशत लोग ही जानते हैं….!! जिसे मुग़ल परस्त इतिहासकारों ने किताबों से मिटा दिया !! बहुत से लोग उनको असम का शिवाजी भी बोलते हैं !!  असम में आज भी लाचित बोरफुकन का नाम बड़े ही सम्मान और गर्व  से लिया जाता है.

जोरहाट से 16 कि.मी. दूरी पर स्थित लाचित मैदान में लाचित के अंतिम अवशेष संरक्षित हैं। वर्ष 1672 में स्वर्गदेव उदयादित्य सिंह द्वारा हूलुंगपारा में निर्मित कराया था। Lachit Borphukan लाचित बोरफुकन

लाचित दिवस:

लाचित बोड़फुकन के पराक्रम, साहस और सराईघाट की लड़ाई में असमिया सेना की विजयगाथा का स्मरण करने के लिए संपूर्ण असम में प्रति वर्ष 24 नवम्बर को ‘लाचित दिवस’ मनाया जाता है। ‘राष्ट्रीय रक्षा अकादमी’ (NDA) का सर्वश्रेष्ठ कैडेट को ‘लाचित मैडल’ से सम्मानित किया जाता है, जिसका नाम लाचित बोड़फुकन के नाम पर ही रखा गया है।

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