अंतिम मुग़ल बादशाह व मशहूर शायर बहादुर शाह जफर के शेर
अंतिम मुग़ल बादशाह व मशहूर शायर बहादुर शाह जफर के शेर

1857 में दस मई को आजादी के जुनून से भरे हुए देसी सैनिक मेरठ से बगावत का बिगुल बजाते हुए ग्यारह मई को दिल्ली पहुंचे तो भारत के 17वें और अंतिम मुगल बादशाह मिर्जा अबू जफर सिराजुद्दीन मोहम्मद बहादुर शाह जफर में (जिन्हें आमतौर पर बहादुरशाह जफर के नाम से जाना जाता है)विश्वास जताकर न सिर्फ उन्हें अपना नेता चुना बल्कि उनकी फिर से ताजपोशी की.

तब तक अंग्रेजों के हाथों अपनी हुकूमत गवांकर लाचार जफर ने, चूंकि तब तक शातिर अंग्रेजों ने उनकी सत्ता को लाल किले तक ही सीमित कर डाला था, इन सैनिकों से पूछा कि उनके पास खजाना कहां है जो वे उन्हें तनख्वाहें देंगे, तो सैनिकों ने जैसे वे पहले से ही इस सवाल का जवाब सोचकर आये हों, वचन दिया था कि वे अंग्रेजों द्वारा लूटा गया उनका सारा खजाना फिर से लाकर उनके कदमों में डाल देंगे.

  1. तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें
    हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया
  2. कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल
    वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए
  3. कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
    इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में
  4. कितना है बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए
    दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
  5. बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
    जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
  6. न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर
    पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा
  7. बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़
    ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था
  8. ‘ज़फ़र’ आदमी उस को न जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का
    जिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा न रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न रहा
  9. दौलत-ए-दुनिया नहीं जाने की हरगिज़ तेरे साथ
    बाद तेरे सब यहीं ऐ बे-ख़बर बट जाएगी
  10. हम अपना इश्क़ चमकाएँ तुम अपना हुस्न चमकाओ
    कि हैराँ देख कर आलम हमें भी हो तुम्हें भी हो
  11. हाल-ए-दिल क्यूँ कर करें अपना बयाँ अच्छी तरह
    रू-ब-रू उन के नहीं चलती ज़बाँ अच्छी तरह
  12. ख़ुदा के वास्ते ज़ाहिद उठा पर्दा न काबे का
    कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफ़िर-सनम निकले
  13. लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
    किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में
  14. हम ही उन को बाम पे लाए और हमीं महरूम रहे
    पर्दा हमारे नाम से उट्ठा आँख लड़ाई लोगों ने
  15. बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
    क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में
  16. तू कहीं हो दिल-ए-दीवाना वहाँ पहुँचेगा
    शम्अ होगी जहाँ परवाना वहाँ पहुँचेगा
  17. न दूँगा दिल उसे मैं ये हमेशा कहता था
    वो आज ले ही गया और ‘ज़फ़र’ से कुछ न हुआ
  18. ऐ वाए इंक़लाब ज़माने के जौर से
    दिल्ली ‘ज़फ़र’ के हाथ से पल में निकल गई
  19. चाहिए उस का तसव्वुर ही से नक़्शा खींचना
    देख कर तस्वीर को तस्वीर फिर खींची तो क्या
  20. इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल
    दुनिया है चल-चलाव का रस्ता सँभल के चल
  21. औरों के बल पे बल न कर इतना न चल निकल
    बल है तो बल के बल पे तू कुछ अपने बल के चल
  22. न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहाना
    मुझे तो होश दे इतना रहूँ मैं तुझ पे दीवाना
  23. ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो
    मिरे फ़साना-ए-ग़म को मिरी ज़बाँ से सुनो
  24. मर्ग ही सेहत है उस की मर्ग ही उस का इलाज
    इश्क़ का बीमार क्या जाने दवा क्या चीज़ है
  25. लोगों का एहसान है मुझ पर और तिरा मैं शुक्र-गुज़ार
    तीर-ए-नज़र से तुम ने मारा लाश उठाई लोगों ने

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