परवीन शाकिर : पाकिस्तान की वो शायर जिसने महिलाओं पर लिखा

परवीन शाकिर : पाकिस्तान की वो शायर जिसने महिलाओं पर लिखा
परवीन शाकिर : पाकिस्तान की वो शायर जिसने महिलाओं पर लिखा

परवीन शाकिर एक बेहतरीन शायरा थीं. बेहद खूबसूरत और कामयाब भी. उनका जन्म पाकिस्तान के कराची में हुआ था. उनके वालिद का नाम शाकिर हुसैन था. उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी में एमए किया और वहीं से पीएचडी भी की. उनका पहला संग्रह ‘खुशबू’ साल 1976 में छपा, और रातों रात वह मशहूर हो गईं. परवीन शाकिर

हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँ
दो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं

अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है
जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा

मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी
वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा

चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया
इश्क़ के इस सफ़र ने तो मुझ को निढाल कर दिया

अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं
अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई

इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चाँद

इक नाम क्या लिखा तिरा साहिल की रेत पर
फिर उम्र भर हवा से मेरी दुश्मनी रही

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की

दुश्मनों के साथ मेरे दोस्त भी आज़ाद हैं
देखना है खींचता है मुझ पे पहला तीर कौन

रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चाँद

वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी
इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी

हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा
क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा

अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊँ तो मुझ को न समेटे कोई

यूँ बिछड़ना भी बहुत आसाँ न था उस से मगर
जाते जाते उस का वो मुड़ कर दोबारा देखना

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