Pita ek putra ki nazar se
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Pita ek putra ki nazar se;  पिता: एक पुत्र की नज़र से, कहानी एक पिता के कठोर दिल की:-

 

                             बाल कृष्ण शर्मा जी हिंदी लेखन जगत की नामचीन हस्तियोँ में शुमार थे। जितनी परिपक्व उनकी सोच उतनी ही आकर्षक उनकी लेखन शैली। हाँ थोड़े अपरंपरागत जरूर थे पर उनको पढ़ो तो स्वछंदता का ज़ायका ज़हन को तरोताज़ा कर देता था। कॉलेज के दिनों से लिखना शुरू कर दिया था और अब लिखते लिखते 25-26 वर्ष हो चुके थे। किशोरावस्था से ही उनकी लेखनी में उनकी स्पष्टवादिता साफ झलकती थी इसलिए मित्र उन्हें ‘बाग़ी’ कृष्ण शर्मा के नाम से भी बुलाते थे।
समाज के बेबुनियादी दस्तूरों को बेझिझक आइना दिखा देते थे और उनकी ‘सोचने पर मजबूर कर देने वाली’ लेखनी के प्रशंसक भी खूब थे। अपने आलोचकों का भी मन मोह लेने वाले शर्मा जी अपनी माता के बहुत करीब थे।  Pita ek putra ki nazar se

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मध्यम वर्गीय परिवार में पले बढ़े शर्मा जी ने अभाव भी झेला था। पिता बच्चों और घर की जरूरतें और ज़िम्मेदारियोँ की आपूर्ति के लिए कस्बे से बाहर किसी शहर में नौकरी करते थे। छुट्टियाँ कम ही मिलती थी तो घर भी कम ही आना होता था और ये भी एक बड़ी वजह थी शर्मा जी का लगाव अपनी माँ से अधिक होने की।
माँ पढ़ी लिखी कम थी पर बच्चों को इस प्रकार पाला था कि बच्चों के संस्कार और व्यवहार देख हर कोई उनकी तारीफ ही करता। माँ को इसी में उसकी त्याग तपस्या का पुरुस्कार मिल जाता।
25-26 वर्ष निरंतर हिंदी साहित्य में अपना योगदान देने के बाद शर्मा जी को उनके प्रशंसकों की अब एक ही फ़रमाइश आती या यूँ कह लीजिए की शिकायत आती। माँ के ऊपर उन्होंने काफ़ी लेख, किस्से, कहानियाँ और कवितायें लिखी थी पर पिता के लिए कभी कुछ नहीं लिखा। हालाँकि उनका रिश्ता अपने पिता के साथ सामान्य ही था परंतु फिर भी कभी उनकी तरफ से कुछ प्रस्तुत नहीं किया गया। लेकिन इस बार वक़्त आ गया था उनकी चुप्पी टूटने का और उनकी कलम को अपनी सार्थकता सिद्ध करने का।

अपने पाठकों और प्रशंसकों के बीच जो उन्होंने प्रस्तुत किया वो कुछ अद्वितीय, अविस्मरणीय और इस प्रकार था….

“एक बच्चा जो अपने बाल्य काल में अधिकांश समय अपनी माँ के साथ ही रहा हो और अगर उसके जीवन मे अभी तक चालाकी और व्यवहार कुशलता का आगमन न हुआ हो, और आप उससे पूछो कि बेटा आप अपने माता पिता में से अधिक किसको पसंद करते हो तो वो बेझिझक और बिना वक़्त गँवाये अपनी माँ का ही नाम लेगा। और ये लाज़मी भी है क्योंकि उसने अपनी माँ को बहुत करीब से देखा है। माँ का प्यार, उसका गुस्सा, उसकी ममता, उसका घबराना, उसकी प्रसन्नता, उसका चिंतित होना…. सबकुछ बिना किसी छलनी से छनकर, जस का तस आपतक पहुँचता है। वो माँ है, उसके चेहरे पर प्रसन्नता होती है तो वो आपका गाल चूम लेती है और आँखों में आँसू आ जाये तो आपका दिल झकझोर देती है। सब कुछ साफ सुथरे झील के पानी की तरह। जो मन में वही ज़ुबान पर….
और शायद इसी लिए हमारी माँ हम भाई बहनों की पढ़ाई और दूसरी चीजों पर होने वाले बढ़ते हुए ख़र्च का ज़िक्र हमसे अक्सर किया करती थी ताकि हमें यह मालूम रहे कि हमको पढ़ लिखकर काबिल और कामयाब बनना है। पर हर बढ़ती जरूरत के साथ आखिरकार हमारी झोली में वो चीज़ किसी प्रकार आ ही जाती थी। माँ घर बहुत अच्छे से सम्भालती थी और शायद कभी कभी अपनी जरूरत की चीजों में कटौती कर लेती थी सिर्फ हमारे लिए। ये एहसास होने पर मेरे दिल मे उनके लिए इज़्ज़त और बढ़ जाती।  Pita ek putra ki nazar se

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माँ अक्सर हमारे खर्चों पर पिताजी के वेतन को नगण्य सा ही बताती थी पर पिता ने कभी अपने वेतन का ज़िक्र हमसे नहीं किया। हाँ जितने दिन वो घर पर होते तो खाना सामान्य दिनों से अधिक अच्छा बनता और माँ को किसी बात की चिंता नहीं रहती थी। फिर न माँ हमें डांटती और न कोई डर दिखाती। हमारी शरारतें भी खुद ब खुद कम हो जाती। माँ उनसे हमारी पिछली शिकायतें भी करती और कभी वो गुस्सा हो जाते तो हमें उनसे पिटने से भी बचाती।
कहते हैं ‘मारने वाले से बचाने वाला महान होता है’। महानता का तो कोई प्रश्न नहीं था पर पहले खुद शिकायत करके माँ जब हमें पिताजी के कोप से बचाती तो उस समय हमें हमारा उनसे बड़ा हितैषी और कोई नहीं लगता।

फिर पहली बार जब कॉलेज के लिए अपने कस्बे से दूर मैं किसी दूसरे शहर रहने गया तो घर से विदा होते वक़्त मेरा दिल बैठ गया। माँ की ममता ने मुझे रोकने की काफी कोशिश की पर पिता की निष्ठुरता के आगे उनकी एक न चली। पहली बार घर छोड़ने की वो आह आज भी मेरे मन मे ज्यों की त्यों स्थापित है। मुझे लगा था कि कॉलेज खत्म होने के बाद मैं वापस अपने कस्बे में लौट आऊँगा और वहीं कोई छोटी मोटी नौकरी करूँगा लेकिन मेरे पिता को ये भी गँवारा नही हुआ।
अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वो मुझे किसी अच्छी नौकरी में ही देखना चाहते थे और उनकी ये चाहत मुझे बहुत महंगी पड़ी। अपना घर परिवार छोड़कर किसी अजनबी जगह रहना और नौकरी करना मेरे बाल्यकाल की स्मृतियों को उजागर कर देता और न जाने कितनी ही रातें मैं आँसुओं के सानिध्य में बिताते हुए सो जाता। नौकरी और घर से दूरी के बीच एक लेखन ही था जो मुझे किसी हद तक आराम पहुँचाता। मुझे अपनी स्थिति देखकर बुरा लगता। पैंसा कमाने के चक्कर मे अगर जीवन जीने के बजाए बिताना पड़ रहा हो तो अफसोस होना लाज़मी है।
उसपर अगर आपकी प्रेमिका भी आपसे दूर हो जाये तो फिर मानो ऐसा लगता है कि जैसे जीवन का अंत नज़दीक है। कॉलेज के समय से ही मैं एक युवती को चाहने लगा था और धीरे धीरे हम दोनों प्यार के रिश्ते में बंध गए। घर से दूर रहने के दर्द को शायद इसी रिश्ते ने कुछ कम किया था लेकिन फिर नौकरी लगते ही हम दोनों भी दूर हो गए। कुछ वक्त तो ठीक रहा किंतु ये ‘लांग-डिस्टेन्स-रिलेशनशिप’ चलाना टेढ़ी खीर से कम नहीं। एक दूसरे के लिए वक़्त न हो पाने के कारण हम दोनों ही ने परिस्थितियों के आगे घुटने टेक दिए। मेरी लेखनी में जो कुछ अपनेपन और दर्द की एक भीनी भीनी सी महक आप लोगों को लगती है वो शायद इसी अधूरेपन की है।

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ख़ैर, वक़्त अपनी रफ्तार से गुज़र ही जाता है। मेरे जीवन में भी कई बदलाव आए। शादी हुई, नौकरी छोड़ी, लेखन जगत में आया और फिर पिछले महीने ही मेरी एकमात्र पुत्री शादी करके अपने ससुराल को विदा हुई। अपनो को खुद से दूर जाते देखना बहुत ही दुखद एहसास होता है। पर समाज की कुछ ऐसी ही व्यवस्था है बेटियों को लेकर। अपनी बेटी को स्वयं से बिछड़ते देख मैं खुद को ऐसे ही तसल्ली दे रहा था। विदाई के वक़्त मुझे काफी बुरा लगा पर मैं रो नही पाया। मुझे खुद को मजबूत बनाये रखना था। अपनी धर्मपत्नी को भी सम्भालना था। पर मेरे ज़हन में हर वक़्त यही चल रहा था। मेरे हाथ कलम पकड़ने के लिए बेचैन से मालूम हो रहे थे। कहीं तो दर्द उड़ेलना ही था। तो एक रात मैंने कड़ियाँ जोड़नी शुरू की और पाया कि विदाई तो मेरी भी हुई थी। हाँ मैं मर्द हुँ और मेरे ऊपर समाज ने ऐसे कोई रीति-रिवाज़ नही बनाये पर लगभग हर मर्द यही तो करता है। हाँ उसको ये जरूर लगता है कि वो कभी भी अपने घर जा सकता है पर उसका ‘कभी भी’ उसके मनमुताबिक कहाँ होता है? उसे कभी पढ़ाई तो कभी नौकरी तो कभी अपने बीवी बच्चों की जिम्मेदारियों का हवाला देके अपने मन को मारना ही पड़ता है। Pita ek putra ki nazar se

फिर मुझे पिताजी का ध्यान आया जिनका ध्यान मुझे लगता था कि सिर्फ हमारे लिए निष्ठुर फैसले लेने पर ही था।
उन्होंने भी तो अपने माँ बाप से दूर रहकर तकलीफें झेलीं। फिर अपनी पत्नी और बच्चों से भी दूर रहे सिर्फ इसलिए कि हम अच्छी शिक्षा हासिल कर सकें और काबिल बन सकें। चाहते तो वो भी हमारे साथ रहते। थोड़ा कम कमाते, हम थोड़ा निम्न दर्जे के स्कूलों में पढ़ लेते और थोड़ी बहुत ज़रूरतें कम पूरी कर पाते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। शायद सिर्फ इसलिए कि कल हम जब अपनी शुरुवात करें तो हमें कम तकलीफें झेलनी पड़ें।
उन्होने कभी हमें अपने वेतन के हिसाब से जरूरतों को काबू में करने के लिए नहीं बोला भले ही उन्होंने अपनी जरूरतों को बेफिजूल ख़र्च मानकर दरकिनार कर दिया हो।
मैं ‘लांग-डिस्टेंस’ का हवाला देकर परिस्थितियों को कोसता रहा और आखिरकार रिलेशनशिप को खत्म कर दिया, हालाँकि वो हम दोनों की ही गलती थी पर मेरे माता पिता भी तो सदा दूर ही रहे थे लेकिन वो परिस्थितियों के हिसाब से ढले न कि परिस्थितियों के आगे बेबस हो गए।
माँ तो हमारे साथ थी, बुरा लगने पर रो देती थी पर पिताजी को तो मैंने कभी रुंआसा भी नही देखा। उनके ऊपर भी तो ये समाज का अनकहा कानून लागू था कि ‘मर्द रोता नही है’। कैसी भी स्थिति हो बस मजबूत बने रहना है और शायद इसी रिवाज़ को निभाते हुए उन्होंने हमारे लिए निष्ठुर फैसले लिए। माँ तो थक हार कर फिर भी उनकी ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख लेती थी पर उनको तो झूठी तसल्ली भी खुद ही से लेनी पड़ती होगी।  Pita ek putra ki nazar se

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अब तो मुझे ये भी लगता है कि शायद अगर मेरे जीवन में वो कठिनाइयाँ ही न आती जो मुझे पिताजी द्वारा मेरे लिए गए घर छोड़ने के फैसले के बाद झेलनी पड़ी तो शायद मेरी लेखनी इतनी प्रभावशाली न होती। मैं चीजों को इतनी गहराई और इतनी स्पष्टवादिता के साथ न कभी समझ पाता और न कभी लिख पाता। मेरे मुकद्दर में शायद लेखक बनना ही लिखा था किन्तु इस अपार सफलता और प्यार के लिए मेरे द्वारा पाए गए अनुभव ही जिम्मेदार हैं जो कि शायद मैं सिर्फ घर पर और माँ की ममता तले रहकर कभी न पा पाता।

माँ की ममता जीवन में मधुरता बिखेरती है पर पिता की निष्ठुरता जीवन में होने वाले उतार चढ़ाव पर कभी न खोने वाला हौंसला देती है।
जैसे जैसे मैं जीवन में आगे बढ़ता जा रहा हूँ मुझे मालूम होता चला जा रहा है कि पिता को घर की सत्ता और घर के मुखिया होने का सौभाग्य तो प्राप्त है पर साथ ही एक घर को सुचारू रूप से चलाने के लिए मुखिया को हृदय को पीड़ा पहुँचा कर पूर्णतयः मस्तिष्क पर निर्भर रहकर ही फैसले लेने पड़ते हैं।
माँ की ममता पर किस्से कहानियाँ लिखकर महिमामंडन तो मैं बहुत पहले से करता आ रहा हूँ पर पिता के नज़रिए को समझ पाना मेरे लिए हर दिन एक नया अध्याय है क्योंकि एक पिता बनकर अब हर दिन मैं पिता के बारे में कुछ नया ही ढूंढ लाता हुँ।

‘मारने वाले से बचाने वाला ज्यादा महान होता है।’
मैंने पहले भी इस व्यक्तव्य को लिखा है पर मुझे खेद है कि अब मैं इसे झुठलाने जा रहा हुँ क्योंकि पिता के संदर्भ में ये बात शायद सटीक नहीं बैठती।

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