Religious and scientific importance of Kalava | कलावे का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

प्रश्न – कलावे का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व बताइये?

उत्तर – कलावा जिसे मौली, चन्द्रमौलि, मणिबन्ध इत्यादि नाम से भी जाना जाता है। मौली हमेशा कच्चे धागे या रेशम के धागे से ही बनाई जाती है। इसमें मूलतः तीन रँग लाल, पीला और हरा ही होता है। यह 3 या 5 धागों से बनती है जिसका अर्थ त्रिदेव की शक्तियां या पंचदेव की शक्तियां धारण करने से है। कहीं कहीं इसमें नीला और सफेद रंग भी उपयोग करते हैं। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा बल और शिव की कृपा से दुर्गुणों के के विनाश की भावना की जाती है।

हमेशा हिंदू धर्म में कई रीति-रिवाज तथा मान्यताएं हैं | इन रीति-रिवाजों तथा मान्यताओं का सिर्फ धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक पक्ष भी है, जो वर्तमान समय में भी एकदम सटीक बैठता है | हिंदू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानि पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन आदि के पूर्व ब्राह्मण द्वारा यजमान के दाएं हाथ में कलावा/मौली (एक विशेष धार्मिक धागा) बांधी जाती है |

किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे कलावा/मौली बांधते है ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे | कलावा/मौली कच्चे सूत के धागे से बनाई जाती है। यह लाल रंग, पीले रंग, या दो रंगों या पांच रंगों की होती है | इसे हाथ गले और कमर में बांधा जाता है |

शंकर भगवान के सिर पर चंद्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है | कलावा/मौली बांधने की प्रथा तब से चली आ रही है जब दानवीर राजा बली की अमरता के लिए वामन भगवान ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था |

आइये जाने कैसे शुरु हुई कलावा बांधने की परंपरा?

वैज्ञानिक करणों पर बात करने से पहले आइये बात करते हैं इसके कुछ धार्मिक पहलुओं पर। शास्त्रों के अनुसार कलावा यानी मौली बांधने की परंपरा की शुरुआत देवी लक्ष्मी और राजा बलि ने की थी।

कलावा को रक्षा सूत्र भी कहा जाता है, माना जाता है कि कलाई पर इसे बांधने से जीवन पर आने वाले संकट से रक्षा होती है।

कैसेगंभीर रोगों से रक्षा करता है कलावा

शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती है।

कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है। इससे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ का सामंजस्य बना रहता है।

माना जाता है कि कलावा बांधने से रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और लकवा जैसे गंभीर रोगों से काफी हद तक बचाव होता है।

कब कैसे धारण करें कलावा

शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।

पर्व त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।

कलावा के बारे आधुनिक उदाहरण से व्याख्या

कलावा एक तरह से मोबाइल चार्ज के पॉवर बैंक की तरह है, एक बार मंन्त्र से अभिमंत्रित करने पर वह 7 दिन तक मंन्त्र ऊर्जा और पॉजिटिव वाइब्रेशन को स्टोर करके रखता है। 7 दिन तक कलावा बांधने वाला लाभान्वित होता रहता है।

जल जिस तरह मंन्त्र वाइब्रेशन स्टोर कर सकता है, वैसे ही मंन्त्र ऊर्जा को स्टोर करने की ताक़त कलावे और यग्योपवीत में होता है।

कलावा बांधने का मंन्त्र

येन बद्धो बलिः राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥

ॐ व्रतेन दीक्षामाप्नोति, दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम् ।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति, श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥

ऐसी मान्यता हैं कि माताओं-बहनों के हाथ से, यज्ञ पुरोहित और पिता के हाथ से कलावा बंधवाने से नकारात्मक शक्ति एवं अन्य बाधाओं से रक्षा होती है । इस प्रकार कलावा बाँधकर दोनों एक दूसरे के कल्याण एवं उन्नति की कामना करते हैं । प्रकृति भी जीवन के रक्षक हैं इसलिए कई स्थानों पर वृक्षों को भी कलावा या सूत बांधी जाती है । ईश्वर संसार के रचयिता एवं पालन करने वाले हैं अतः इन्हें भी रक्षा सूत्र अवश्य बांधना या चढ़ाना चाहिए ।

यह सृष्टि लेन-देन और कर्म के सिंद्धान्त पर आधारित है। देवता भी पहले समर्पण और भक्ति लेते हैं तब ही उनकी कृपा का मनुष्य अधिकारी बनता है।

कलावा ईश्वर के साथ साझेदारी का भी प्रतीक है। ईश्वर के साथ यह मित्रता-साझेदारी नित्य उपासना, साधना, आराधना, समयदान और अंशदान पर आधारित होती है। जो कलावा बांधता है वो इन उपरोक्त नियमो को पालन करने का वचन देता है, बदले में उसे ईश्वर की कृपा और सुरक्षा का आश्वासन मिलता है।

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