A true story Sajjan purush

A True story Sajjan purush, ढकोसला एक चोर का, पढ़ें कहानी सज्जन पुरुष:-

 

                           कुछ दिन पहले जब मुझे एक सरकारी नौकरी से समबन्धित परीक्षा देने के लिए घर के नजदीक ही एक स्टेशन से भोर में गाड़ी पकड़ कर जाना पड़ा .. इतने बड़े सफर का कोई हमसफ़र नहीं था सिवाय मेरे एक बैग , जिसमे अम्मा के द्वारा दीए गये पराठे ,कुछ प्रतियोगीरीक्षा से समबन्धित मैगजीन ,एक बॉटल , … संयोग से मुझको खिड़की के तरफ की सीट मिल गयी जो मेरा सबसे प्रिय स्थान होता हैं… मेरे बगल वाली सीट में एक अधेड़ उम्र के “चाचा जी” जो एक सरकारी अध्यापक थे, और उसके सामने वाले सीट पे कुछ हमउम्र के प्रतियोगी छात्र थे जो आपस में जोर-जोर से ठहाके लगा कर बात कर रहे थे ..कभी-कभी कुछ व्यंगात्मक अंदाज में चाचा जी उनके बातो में हस्तक्षेप कर देते जिससे सभी यात्रियों के चहरे पर से थकान ,और सफर की उबान की लकीरे मिट जाती, रेलगाड़ी भी हर प्लेटफॉर्म पर रुक रुक कर चल रही थी मानो हमे यही बता रही थी कि जिंदगी में भी कई प्लेटफॉर्म आते है परन्तु हमें रुक रुक के ही क्यों ना ..परन्तु हमें जब तक हमे अपना निर्धारित लक्ष्य या प्लेटफॉर्म ना आ जाये हमें रुकना अथवा थकना नहीं चाहिए …

Sajjan purush

यह मेरा पहला प्रतियोगी परीक्षा था, इसलिए मन में एक भय समाया हुआ था जिसके कारण मै कभी बैग से नोट्स कभी सामान्य ज्ञान की मैगज़ीन निकालता और पढ़ना शुरू कर देता परन्तु यह स्थिरता कुछ ही मिनटों में भंग हो जाता…क्योकि खिड़की से दिखते हरे हरे घास के मैदान ,रंग-बिरंगे घर , और सूखे खेत , सूखे कुंवे,कच्चे मकान , आदि उस समय के मेरे सबसे बड़े बैरी बन चुके थे … लेकिन शायद वो सभी मेरे कानो में यही कह रहे थे कि, जिंदगी भी कुछ इसी तरह का सफर है जिसके खिड़की से झांकने पर आपको ख़ुशी और शांति रूपी हरे भरे घास के मैदान तो वही दुःख रूपी सूखे कुंवे,कच्चे मकान आते रहते है अतः कभी इनसे घबराना मत और सफर जारी रखना …
इसी बिच एक छोटे से स्टेशन पर गाड़ी रुक जाती है …
एक सांवली सी लड़की जिसकी उम्र कुछ 20-21 रही होगी ,,जिसके हाँथ में एक छोटा सा थैला था और दुपट्टे से अपना सर ढकते हुए …
चाचा थोड़ा उधर खिसक जाइये मै बच्चे को गोदी में लिए देर तक यु खड़ी नहीं हो सकती ….कुछ निवेदन भाव से उस लड़की ने चाचा जी से बोली..
चाचा जी ने सभ्य नागरिक का परिचय देते हुए उसे अपने बगल जगह दे दिए …
तभी गाड़ी एक जोर के सिटी के साथ स्टेशन से रवाना हो गयी ..
लड़की से बात चित करने से हमें पता चला कि उसका पति पास के ही शहर में एक छोटे से कंपनी में काम करता था लेकिन आज सुबह ही ट्रक से चावल की बोरी निकालते समय बोरिया उसके ऊपर गिर गयी …जिसके कारण उसका दाहिने पैर की हड्डी टूट गयी है और वह एक अस्पताल में भर्ती है, जिसे देखने के लिए वह घर से जा रही थी ….
सफर के थकान से चाचा जी भी सूस्त हो गए थे और चिर निद्रा में विलीन हो गए …मै भी पूर्व कि भांति पुनः उन पन्नो पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयत्न करने लगा …. लगभग एक से डेढ़ घंटे बित चुका थी अचानक चाचा जी के जोर की आवाज ने सबको चौका दिया …
मेरे बैग के ऊपर के खाने में रखा मेरा पर्स गायब हो गया जिसमे मेरा दो हजार रुपया था और मेरा कुछ जरुरी दस्तावेज था …जोर की आवाज के साथ चाचा जी ने कभी अपने पैंट की जेब कभी सीट कभी बैग को तलाशना शुरू कर दिए ….
सभी यात्री चकित थ क्योकि कोई अन्य व्यक्ति अभी तक वहा पे नहीं आया था … कुछ ने सभी की जेब तलाशी लेने ,तो कुछ ने रेल विभाग के र्मचारियों से शिकाये का सुझाव दिए …चाचा जी भी पुरे जोश के साथ रेल पुलिस फोर्स (R.P.F.) के टॉल फ़्री नंबर पर फ़ोन लगाए उधर से आश्वासन मिला की अगले स्टेशन पर तैनात (r.p.f) के जवान आपकी मदद करेगी … कुछ ही मिनटों में अगली स्टेशन भी आ पहुंचा … खट-खट के आवाज के साथ एक महिला और एक पुरुष सिपाही अंदर प्रवेेश की…

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कांता प्रसाद कौन है ..??( जोर की आवाज के साथ )r.p.f के सिपाही ने पुछा …
सर मै हु ..!!(चाचा जी) जिनका नाम कांता प्रसाद था कुछ दबे स्वर में उत्तर दिए …
और बात को जारी रखते हुए चाचा जी बोले कि ,चोरी की शिकायत हमने की थी ,परन्तु अभी चंद मिनट पहले मुझे मेरा पर्स वापस मिल गया अतः अब आप जा सकते है ….
मुझे चाचा जी का ये उत्तर सुन अजीब लगा ..चंद सेकंड पहले तक इनका पर्स गायब था फिर अचानक मिल कैसे गया …
गाड़ी फिर चल पड़ी अगला स्टेशन बहुत बड़ा था, और सामान्यतः वहाँ पर गाड़ी 10-15 मिनट तक रुकती है..इन सब के बिच मेरा मन यह मानाने को तैयार नहीं था की चाचा जी का पर्स मिल गया…तभी अगला स्टेशन आ गया … वो सांवली लड़की सीट से उठने लगी शायद उसे यहीं उतरना था ..लेकिन चाचा जी भी उसके पीछे-पीछे उतरने लगे… मुझको भी जोरो की प्यास लगी हुई थी तो मै भी बॉटल भरने के लिए स्टेशन पर उतर गया …
चाचा जी मुझसे कुछ दुरी पर ही थे ,अचानक चाचा जी ने उस साँवली लड़की को रुकने के लिए बोले..
और उसके पास पहुंचे …उस लड़की के चहरे पे पसीने की बुँदे टपकने लगे कुछ घबराई घबराई सी नजर रही थी ….चाचा जी ने कहा –
जो तुम्हारे थैले में एक पर्स है वो मेरा है और तुम चुराई हो उसे..ये मैं जानता हु …क्योकि जैसे ही मैंने पुलिस को फ़ोन किया वैसे ही चंद सेकंड बाद ही मैंने तुम्हरे थैले से झलकते अपने अपने पर्स को देख लिया था … चाहता तो मै तुझे पुलिस के हवाले कर देता या फिर डिब्बे में शोर कर देता तो तुम पुलिस के हांथो मार खाती या फिर भीड़ तुम्हे थप्पड़ मार-मार कर तुम्हारी बेइज्जती कर देती …
लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया क्योकि मुझे तुममें एक चोरनी का चेहरा नही दिखा ,बल्कि एक बेबस लाचार ,और उससे भी बढकर एक भारतीय नारी का अक्स दिखा… जिसके लिए उसकी इज्जत दुनिया की सभी दौलतो से ऊपर है …

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वो सांवली लड़की चाचा जी के पैरो में गिर कर रोने लगी है और पर्स लौटाने लगती है …परन्तु चाचा जी ने अपने दस्तावेजों को उस पर्स में से निकालकर रुपये सहित उस लड़की के हांथो रख दिए..
और अपने सीट पे जाके बैठ गए ..
ये वाकया देख मै निस्तब्ध था …
बॉटल में पानी भरा और एक संतोष की गहरी सांसे ली .. पानी को पीते हुए आके अपने सीट पे बैठ गया…… और खुद पे गर्व भी हुआ कि मै उस देश का बेटा हु जहांआज भी चाचा जी जैसे लोग रहते है ..जो पैसो से बढ़कर अहमियत किसी की नारी की इज्जत ,उसके बेबसी और इंसानियत को देते है …..

……… कुमार दुष्यंत

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