“वीर-बर्बरीक ,कहानी कलियुग के खांटू-श्याम की” Story of Barbarik

Story of Barbarik

“वीर-बर्बरीक ,कलियुग के खांटू-श्याम की” Story of Barbarik:-

भूमिका– कुरूक्षेत्र का मैदान सिर्फ कौरव या सिर्फ पांडवों की शूरवीरता के बखान की कहानी नहीं है। यह भारत की पुण्य भूमि वह सलिला है जिसमें ऐसे सशक्त
वीरों की वह गंगा बहती थी जिनके भुजाबल में वह शक्ति थी कि उनके एक बाण में ही वह क्षमता थी कि इस पूरे युद्ध के अंतिम क्षण में परिणाम बदल सके।
ऐसे ही एक महावीर भीम के प्रपौत्र, पिता घटोत्कच और नाग वंश की माता कामकंटाकटा या मौरवी के जयेष्ठ पुत्र बर्बरीक की कथा है। इन्हें माता की तरफ से यह शिक्षा मिली थी कि जो पक्ष हार रहा हो, तुम्हें उसका साथ देना है, और कृष्ण की चिंता भी यही थी कि अगर कौरवों को हारते देख बर्बरीक उनके पक्ष से लड़े तो युद्ध के अंतिम निर्णय प्रभावित होंगे !!

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वीर बर्बरीक को शिव की तपस्या के फल स्वरूप ऐसे तीन बाण मिले थे ,जिनकी शक्ति से आकाश, पाताल, धरती तीनों का नाश हो सकता था। अनेक यज्ञों से प्रसन्न अग्नि देव ने धनुष प्रदान किया था। बर्बरीक अद्भुत देवी भक्त थे, चौदह भुवनों की देवियाँ प्रसन्न थी ।
कृष्ण को शीश दान के बाद इन देवियों ने ही अमृत छिड़ककर शीश को अमर कर दिया था, बर्बरीक की संपूर्ण कथा का वर्णन स्कंद पुराण में वर्णित है, वही अमर शीश आज खांटू श्याम के नाम से पूजित है ………..

शेष कथा यहाँ है………..

सज रहा था कुरूक्षेत्र,
आसन्न युद्ध था !
दमन की पराकाष्ठा थी,
क्रोध का दावानल था !!

नीले घोड़े पर सवार,
यह कौन आगत है !
कृष्ण थे सर्वज्ञानी ,
सब कुछ थे भाँप रहे !!

धर ब्राह्मण वेश पास गए,
कौन हो तुम, जरा बतलाओ !
आगमन का उद्देश्य है क्या,
अपना परिचय कह जाओ !!

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पुत्र मै घटोत्कच का,
मात मेरी कामकंटाकटा !
समर देखने की इच्छा,
है यहाँ ले आयी !!

लडूँगा उनके पक्ष में,
जो हार रहे होंगे !
माता मौरवी से यही,
शिक्षा मैंने है पायी !!

देखा कृष्ण ने गौर से,
उस गरजते बालक को !
तूरीण में तीन बाण,
हाथ में धनुष था !!

हाथ में हमेशा मोर छड़ी,
दिखा बड़ा दृढ-निश्चचयी !
माता की शिक्षा में ढला,
बालक तेजवान था !!

लाखों सैनिकों की जमघट में,
ये तीन बाण क्या करेंगे !
क्यों कर रहे हो, यह परिहास मुझसे,
कृष्ण ने छेड़ दिया !!

शिव की अनंत भक्ति से,
मिले ये तीन बाण मुझे !
यज्ञों की धधक से अग्नि देव का ,
प्रसाद है धनुष मेरा !!

अग्निदेव ने प्रसन्न होकर,
स्वयं मुझे है दिया !
माँ अम्बा की कृपा की,
छाया भी है गहरी !!

एक तीर काफी है,
लाखो शरोंच्छेदन को !
लक्ष्य संधारण कर फिर,
वापिस रहेगा तूरीण में !!

तीन बाण से आकाश,
पाताल,धरा विनष्ट होगी !
शेष कुछ रहे नही,
पुनः संधान करने को !!

पीपल के इस वृक्ष के,
हर पात को छेद दो !
देखूँ मैं भी तो ,
तुम्हारी इस कला को !!

विहँस कर कहा कृष्ण ने,
पाँव तले एक पात दबा लिया !
आश्चर्य था वह दृश्य, जो था घट रहा,
एक ही बाण था,सभी पत्तों को छेद रहा !!

कृष्ण के पांवो के समीप,
तीर वह ठिठक गया !
पांव हटाइए विप्र,
गंभीरता से बालक ने कहा !!

पांव छेदने की आज्ञा नहीं इसे,
एक भी पात यह छोड़ेगा नहीं !
पाँव जो हटा नहीं,
तो घायल करे उसे भी !!

अद्भुत है कला तुम्हारी,
विहँस कृष्ण ने कहा !
विप्र हूँ, दान लेना धर्म है मेरा,
एक दान की करूँ,
क्या आशा तुमसे ?

दे दो अपना शीश मुझे,
समर भूमि में बलि के लिए !
तुमसे बढकर उत्तम क्षत्रिय,
इस धरा पर कोई नहीं !!

एक पल को बालक स्तब्ध हुआ,
विहँसा और पुनः कहा !
तात यह साधारण विप्र की माँग नहीं,
कौन हैं आप, सही परिचय दें अभी !!

कृष्ण हूँ मैं, पांडवों के साथ हूँ,
एक उत्तम क्षत्रिय के !
इस कुरू समर को,
बलि की जरूरत है अभी !!

तुमसे बढकर क्षत्रिय,
इस धरा पर कोई नहीं !
विराट रूप जो दिखलाओ,
करूँगा शीश दान भी !!

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जानते थे कृष्ण कि पांडवों की,
विजय तभी सुनिश्चित होगी !
दे दिया इसने साथ अगर कौरवों का,
कोई निर्णय हो सकेगा नहीं !!

फाल्गुन मास की एकादशी को,
दर्शन किया कृष्ण के विराट रूप का !
द्वादशी को विहँसते बालक ने,
शीश अपना कृष्ण को अर्पित किया !!

तभी आ गयी चौदह देवियाँ,
चौदह भुवन की वहाँ !
तुरंत शीश पर अमृत का,
देवियों ने छिड़काव किया !!

हमारे भक्त के संग कृष्ण तुमने,
क्यों ऐसा व्यवहार किया !
सर्व शक्तिमान क्षत्रिय बालक से,
उसका शीश क्यों माँगा !!

पूर्वजन्म का शापित यक्ष,
नाम था इसका सूर्य वर्चा !!
उस जन्म में भी इसको,
अपने बल का अभिमान था !!

मुक्ति होगी इसकी ऐसे,
विष्णु का वरदान था !
इस जन्म में, कृष्ण रूप में,
श्राप मुक्त करना ही था !!

तभी अमर शीश से बर्बरीक ने,
कृष्ण से की एक याचना !
हे प्रभु, मुझे स्थान प्रदान करें,
संपूर्ण युद्ध है मुझे देखना !!

पास के पर्वत शिखर पर,
खांटू नामक स्थान था !
कलियुग के तुम श्याम होगे,
कहकर वहाँ स्थापित किया !!

कलियुग में हारे का सहारा होगे,
एक माँगे के लाख दोगे !
लखदातार कहलाओगे, मोर दंड़ी वाला,
खांटू श्याम के नाम से पूजे जाओगे !!

कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त कर,
खांटू श्याम के नाम से विख्यात हुए !
अपनी दिव्य दृष्टि से बर्बरीक ने,
संपूर्ण महाभारत का अवलोकन किए !!

यह कथा है तीन बाणों वाले,
शूरवीर की !
नाम था जिसका बर्बरीक,
आज के खांटू श्याम की !!

साधना मिश्रा “समिश्रा “

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