ईश्वर के दर्शन से हमें शांति मिलती है। और ईश्वर आराधना से हमारे कष्ट भी दूर होते हैं। मन जाता है कि भगवान के दर्शन मात्र से ही कई जन्मों के पापों का प्रभाव नष्ट हो जाता है। इसी वजह से घर में भी देवी-देवताओं की मूर्तियां रखने की परंपरा है , इसी वजह से घरों में छोटा सा मंदिर रखने और देवी देवताओ की प्रतिमाओं को रखने का चलन है। दोस्तो पिछले कुछ वर्षों से वास्तुशास्त्र के प्रति लोगों का आकर्षण बहुत बढा है।इसलिये आजकल लगभग सभी अखबारों व पत्रिकाओ में वास्तुशास्त्र पर लेख छपते रहते हैं। लगभग सभी में यह छपा होता है कि पूजा का स्थान भवन के ईशान कोण में होना चाहिए। यदि किसी घर में पूजा का स्थान ईशान कोण में न हो और परिवार में रहने वालों के साथ कोई परेशानी हो तो उनके मस्तिष्क में एक ही बात उठती है कि परिवार की समस्या का कारण पूजा के स्थान का गलत जगह पर होना है। हमें ये पता नहीं चल पाता कि हमें आखिर किस स्थान पर मंदिर को रखना चाहिए।

ज्यादातर वास्तुशास्त्री पूजा घर को भवन के उश्रर व पूर्व दिशाओं के मध्य भाग ईशान कोण में स्थानान्तरित करने की सलाह देते है। घर की किस दिशा में पूजा के स्थान का क्या प्रभाव प़डता है आज हम इसी बारे में जानेंगे।

1.ईशान कोण : ईशान कोण में पूजा का स्थान होना बहुत शुभ और अच्छा माना जाता है। इससे परिवार के सदस्य सात्विक विचारों के होते और उनका स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है।

2.पूर्व दिशा : पूर्व दिशा में पूजा स्थान होने से घर का मुखिया सात्विक विचारों वाला होता है और समाज में प्रसिद्धि पाता है। उसमे निर्भीकता होती है और हर कार्य का निर्णय स्वयं लेने की सामर्थ्य रखता है।

3.पश्चिम दिशा : पश्चिम दिशा में पूजा स्थान होने पर घर का मुखिया धर्म के उपदेश तो देता है परंतु धर्म की अवमानना भी करता है। वह बहुत लालची होता है और गैस की समस्या से भी पीडित रहता है। मन अशांत रहता है और किसी दूसरी स्त्री के साथ संबंधों के कारण व्यक्ति की बदनामी भी होती है। घर का मुखिया घूमने का भी शौक़ीन होता है।

4.उतर दिशा : उत्तर दिशा में पूजाघर हो तो घर के मुखिया के सबसे छोटा भाई, बहन, बेटा या बेटी विद्वान होती है। घर में सकारात्मकता का माहौल बना रहता है।

5.दक्षिण दिशा : दक्षिण दिशा में पूजाघर होने पर उसमें सोने वाला पुरूष बहुत जिद्दी, गुस्से वाला और भावना प्रधान होता है। साथ ही वे अत्यधिक लालची स्वभाव के होते हैं।

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