truth of Naseeruddin shah in hindi

फ़िल्म एक्टर नसीरुद्दीन शाह देश के माहौल पर चिंतित हैं। आज 21 दिसंबर के दैनिक जागरण में छपे समाचार के अनुसार “उन्हें लग रहा है कि कई इलाक़ों में एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या से एक गाय की हत्या को अधिक अहमियत दी जा रही है।” वो अपनी संतानों की भलाई को ले कर चिंता जताते हुए कहते हैं, “मैंने अपने बच्चों को किसी ख़ास धर्म के मानने वालों की तरह नहीं पाला है।” वो भारत में हिंसा के वर्तमान माहौल पर सवाल उठाते हुए कहते हैं “लोगों को क़ानून हाथ में लेने की छूट दी गयी है। बहुत से इलाक़ों में देखा जा रहा है कि एक गाय की मौत की अहमियत एक पुलिस वाले की मौत से अधिक है। अब इस जिन्न को बोतल में डालना बहुत मुश्किल हो गया है। truth of Naseeruddin shah in hindi

मॉब लिंचिंग {उन्मादी भीड़ की हिंसा} पर सवाल उठाते हुए नसीरुद्दीन शाह को अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता सताती है। अपनी दूसरी पत्नी रत्ना पाठक का ज़िक्र छेड़ते हुए हुए कहते वो कहते हैं “मुझे अपनी औलादों के बारे में सोच का फ़िक्र होती है क्योंकि मैंने अपने बच्चों इमाद और विवान को मज़हब की तालीम बिलकुल नहीं दी। हमने उन्हें अच्छी और बुराई के बारे में सिखाया है और मेरा मानना है कि अच्छाई और बुराई का मज़हब से कोई लेना-देना नहीं है। हमने उन्हें क़ुरआन की कुछ आयतें ज़रूर सिखाई हैं ताकि उनका उच्चारण स्पष्ट हो सके। जैसे मूल रामायण और महाभारत पढ़ने से उच्चारण सुधरता है।”

तगड़े प्रयास के बाद भी जब मैं उनकी दृष्टि से इन बातों को देखने-समझने में सक्षम न हो सका तो , मुझे लगा अब उनके कहे को वेद-वाक्य न मान कर इसकी झाड़-पोंछ करनी चाहिए। सबसे पहले “कई इलाक़ों में एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या से एक गाय की हत्या को अधिक अहमियत दी जा रही है।” पर बात करते हैं। नसीरुद्दीन शाह जी, क्या आपको जानकारी है कि भारत में बड़े पैमाने पर गौहत्या को पाप समझा जाता है। आप जिस मुंबई में रहते हैं वो महाराष्ट्र प्रान्त का भाग है और वहां गौ ही नहीं गौ वंश की हत्या क़ानूनन जुर्म है ?

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क्या आप जानते हैं कि 1857 का विद्रोह कारतूसों पर इसी गौ की चर्बी के कारण भड़का था। जिसमें ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन विदेशी आक्रमणकारी मुग़ल सत्ता के साथ भस्म हो गया था। हमारे लिये गौ जानवर नहीं है, माँ है और उसकी जान लेना हत्या है, पाप है। हमारे प्रतापी पूर्वज गौहत्या करने वाले पापियों से जूझते, लड़ते, उनका वध करते, अपने प्राण देते आये हैं। हरियाणा में पूज्य हरफूल जाट के गीत गए जाते हैं। इन्होंने बूचड़खानों पर आक्रमण कर क़साइयों का वध किया था। आपको जानकारी है कि गौ की हत्या होती है और उसके प्राण लेने वाले क़साई का वध होता है ?

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आप जानते ही होंगे कि हम हिन्दुओं को अपमानित करने के लिये इस्लामी सत्ता गौहत्या करती थी। यह सदियों से हमारे लिये जीवन-मरण का प्रश्न रहा है। लुँजपुँज अंतिम मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फ़र तक ने दुष्ट वहाबियों के दबाव के बावजूद गौहत्या पर रोक लगायी थी और उसका उल्लंघन करने वाले पापियों को तोप के मुँह से बांध का उड़ा देने के आदेश दिए थे। क्यों हमारे प्रतापी पूर्वज 1857 में अपने बीबी-बच्चों की सुरक्षा और अपने जीवन की चिंता छोड़ गौ-हत्यारों को यमलोक पहुँचाने में लग गए थे।

नसीरुद्दीन शाह जी कृपया बताइये कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी, विदेशी आततायी सत्ता ‘मुग़ल शासन’, लाखों भारतीयों के जीवन को लील जाने वाला विप्लव एक इंस्पेक्टर के जीवन से अधिक या उसके बराबर या उससे कम महत्वपूर्ण है या नहीं ? मॉब लिंचिंग {उन्मादी भीड़ की हिंसा} शब्द का प्रयोग करते हुए कभी आपके ध्यान में आया है कि तथाकथित मॉब लिंचिंग की यह घटनायें 120 करोड़ के देश में कितनी करोड़ ? कितनी लाख ? कितनी हज़ार या कितनी सौ हुई हैं ? क्या आप या कोई आप जैसा चतुर पुरे देश ऐसी केवल एक दर्जन घटनाएँ भी बता सकता है ?

आप कहते हैं कि “मुझे अपनी औलादों के बारे में सोच का फ़िक्र होती है क्योंकि मैंने अपने बच्चों इमाद और विवान को मज़हब की तालीम बिलकुल नहीं दी। हमने उन्हें अच्छी और बुराई के बारे में सिखाया है और मेरा मानना है कि अच्छी और बुराई का मज़हब से कोई लेना-देना नहीं है। हमने उन्हें क़ुरआन की कुछ आयतें ज़रूर सिखाई हैं ताकि उनका उच्चारण स्पष्ट हो सके। जैसे मूल रामायण और महाभारत पढ़ने से उच्चारण सुधरता है।” पता नहीं आपकी जानकारी में है या नहीं कि भारत में अरबी नहीं बोली जाती अतः अरबी उच्चारण की आवश्यकता ही नहीं होती । यदि किसी को उर्दू उच्चारण की बात ध्यान में आयी हो तो निवेदन करता चलूँ कि अरबी उच्चारण उर्दू उच्चारण से बहुत भिन्न है।

ऐन, हे, ज़ाल जैसी अनेक ध्वनियाँ केवल अरबी में ही प्रयोग होती हैं। अरबी में ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध और न जाने कितनी ध्वनियाँ बोली, लिखी नहीं जातीं। तो फिर उच्चारण सुधारने के लिए क़ुरआन की आयतें किस लिये सिखाई गयीं ? साहब जी हम रत्ना शाह तो हैं नहीं जो दाम्पत्य बचने के लिये आपकी इन धूर्त बातों की अवहेलना कर दें । हम तो इन शहद में लिपटी हुई ज़हरीली गोलियों को दूर से भाँपने में ट्रेंड लोग हैं। आख़िर हमने क़ुरआन, हदीसें पढ़ी हैं। वास्तविक इतिहास पढ़ा है। भारत में इस्लामी काल में कुफ़्र को मिटाने की प्रक्रिया में अपने असंख्य बंधुओं की हत्याओं, अनगिनत बंधुओं के दास बनाये जाने, अगणित बहनों भोग दासी बना कर मध्य एशिया के बाज़ारों में बेचे जाने, लाखों मदिरों के नष्ट करने, विश्विद्यालयों को ध्वस्त करने, पुस्तकालयों के जलाये जाने को जानते हैं।

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हमें ज्ञात है कि क़ुरआन मुसलमानों से इतर समाज के बारे में क्या कहती है। आपकी पत्नी श्रीमती रत्ना शाह को तो निश्चित ही यह नहीं पता होगा अन्यथा वह आपसे विवाह नहीं करतीं मगर सच-सच बताइये कि क्या आपको भी नहीं पता कि क़ुरआन मुसलमानों से इतर समाज के बारे में क्या कहती है ? मुशरिक़ों यानी हिन्दुओं के बारे में क़ुरआन का क्या स्वर है। ईमान से सच बोलियेगा। आपकी याददाश्त के लिए कुछ आयतें दृष्टव्य हैं।

ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { 2-191 }
काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
ऐ नबी ! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख़्ती करो। उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर, जो उसे हराम नहीं जानते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है। उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें { 9-29 }

यह धरती अरबी अल्लाह, अरबी दीन, उसके अरबी पैग़ंबर की मान्यताओं की धरती नहीं है अपितु तत्वदर्शी महर्षियों, वैदिक ऋषियों, चक्रवर्ती सम्राटों की भूमि है। इसकी सार्वकालिक, तार्किक, मानवाधिकारी मान्यताएँ हैं। उनकी अवहेलना, उनके साथ खिलवाड़ करने वालों को यह स्मरण तो रखना पड़ेगा कि ऐसा करना असुविधाजनक हो सकता है। राम राम जी राम राम

तुफ़ैल चतुर्वेदी

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