Urmila’s letter for Laxman, एक पत्र उर्मिला का प्रियवर लक्ष्मण के नाम

Urmila's letter for Laxman

Urmila’s letter for Laxman, एक पत्र उर्मिला का प्रियवर लक्ष्मण के नाम:-

भूमिका- –रामायण हिंदू धर्म की वह वृहद गाथा है जो मानव मन के विभिन्न आयामों से रिश्ते- नातों के सर्वोच्च सोपानों की व्याख्या करता है। आदर्श भाई, पति,पत्नी, बंधु-बांधव, यहाँ तक की शत्रु और शत्रुता भी आदर्श के श्रेष्ठ सोपान हैं । यह सिर्फ हिंदू धर्म ग्रंथों में ही परिलक्षित होता है कि शत्रुओं की वीरता का बखान भी प्रशंसा का विषय होता है।

अन्य कहीं भी आप यह भाव नहीं देख सकते है क्योंकि जो विजयी होता है,वह इतिहास में भी इच्छानुसार परिवर्तन कर लेता है।
फिर भी महाकाव्य में कुछ पात्र अपने योगदान जितना भी स्थान प्राप्त नहीं कर पाते है।
राम के प्रिय अनुज लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला जो माता सीता की भगिनी भी थी, वे उपेक्षित रह गयीं। जबकि उनका त्याग भी किसी मायने में कम नहीं था। चौदह वर्ष का वनवास, अपने पति से दूर रहकर उन्होंने भी भोगा था। सीता वन में थीं, पर पति के संग थी,उर्मिला महल में
थीं, पर अपना यौवन काल, पति से दूर रहकर वनवास… जैसा ही भोगा था। लक्ष्मण राम सीता के रक्षा के लिए… चौदह वर्ष बिना निद्रा के काटे थे। जो मेघनाद-वध के लिए जरूरी भी था, क्योंकि तीन शर्तों में एक शर्त यह भी थी कि उसका वध वही कर सकता है जो चौदह वर्ष बिना निद्रा के हो।
कहते हैं कि जब निद्रा लगने लगी लक्ष्मण को, तो उन्होंने
निद्रा देवी से याचना की कि उनके हिस्से की निद्रा भी उर्मिला को दे दी जाए, अगर वह स्वीकार करती हैं तो?

Urmila’s letter for Laxman

उर्मिला ने पति के लिए यह स्वीकार किया और चौदह वर्ष वह पति की निद्रा सोतीं रहीं ताकि वन में पति अपनी पूरी निष्ठा से अपने तपस्या को पूर्ण कर सके।
उर्मिला भी प्रातः स्मरणीय सतियों में शामिल हैं, इनके पतिव्रत का बखान तो युद्ध भूमि में सती सुलोचना के इन वचनों से ही हो जाता है, जब सती सुलोचना लक्ष्मण से कहती हैं कि हे सुमित्रा नंदन, मेरे पति के वध का गर्व कभी नहीं करना, त्रिलोक में किसी की क्षमता नहीं है कि वह मेरे पति का वध कर सके, यह तो उर्मिला के पतिव्रत धर्म का प्रताप है कि आज मेरे पति युद्ध भूमि में हत हुए। Urmila’s letter for Laxman

Urmila's letter for Laxman

इससे बड़ी प्रशंसा और क्या हो सकती है सती उर्मिला की।
उर्मिला के मन की व्यथा, वह लक्ष्मण के नाम लिखे एक पत्र में है, जिसे पढ़ने के लिए लक्ष्मण को ही वापिस आना था अवध में, चौदह साल का वनवास काटकर…….

वह व्यथा यहाँ है ………..

हे प्रियवर, हे मेरे लखन !
मन में लगी, विरह अगन !!

एक पाती तुमको हूँ , मैं लिख रही
व्यथा मेरे मन के, हूँ मैं खोल रही

तुम्हें लिखा यह, मेरा पहला पत्र है !
मिलन हमारा अभी, चौदह बरस दूर है !!

तुम रहो भगिनी सीता, संग प्रिय राम के !
विरहणी की दशा गुजारूं, मैं तुम्हारे नाम से !!

Urmila’s letter for Laxman

 

कल आईं थीं निद्रा देवी, अनुज्ञा लेने मेरे पास !
विनय नहीं तुम्हें मुझे, देना था अपना आदेश !!

कभी स्वप्न में भी तुम्हारे, मै न आ आऊँगी !
सोओगे ही नहीं तुम, तो कैसे दिख पाऊंगी !!

Urmila’s letter for Laxman

चौदह बरस तक अब, मै निद्रा लीन हूँ !
नींद तुम्हारे हिस्से का भी, अब मुझे सोना है !!

निज धर्म से, निज कर्म से, तुम्हारी ही रहूँगी !
तपस्या में, सुकर्म मे, तुम्हारे बाधा क्यों बनूंगी !!

पत्नी हूँ तुम्हारी, हर पग संग चलूंगी !
रहोगे तुम भूखे वहाँ, क्या मै भोजन करूँगी !!

लिया था वचन तुमने, अश्रु कभी नहीं बहाना !
बह न सकेंगे एक बूँद भी, यह संकल्प मैंने ठाना !!

श्वसुरश्री मेरे, काल कवलित हो गए !
बूँद भर अश्रु भी मेरे, देखो कभी नहीं बहे !!

याद में तुम्हारे, क्या मैं आंसू ढलकाती हूँ !
नहीं मेरे परमेश्वर, समुद्र बन सोख जाती हूँ !!

पिता जनक आये थे, अयोध्या से मुझे लिवाने !
छोड़ कर जाना नहीं, पिया का घर मेरा ठिकाना !!

पतिव्रता का धर्म ही, युद्ध काल में रक्षित होगा !
सुलोचना से जब ठनेगी, धर्म मेरा विजयी होगा !!

तपस्या तुम्हारी वन में, सीता राम रक्षार्थ की !
मेरी अवध में, पतिव्रत धर्म के पुरूषार्थ की !!

स्मरण होगा तुम्हें, वन गमन के विदा का समय !
कर रही थी जतन मैं , सोलह श्रृंगार का !!

रूष्ट थे, क्रूद्ध थे तुम, जब यह वचन कहा था मैंने !
ब्याह किया था मैंने तो, महलों के सुख पाने के लिए !!

स्वीकारती हूँ कि अपने प्रति, मोह भंग का था प्रयास !
साक्षी है मेरा अंतर्मन, साक्षी है यह धरा आकाश !!

विचलित जो होते प्रेम में, क्षमा स्वयं को कर पाती नहीं !
पति के कर्तव्य पथ पर, भार्या कभी बाधा बनती है कहीं !!

हस्ताक्षर तुम्हारी उर्मिला के, है पत्र के अंत में !
प्रतीक्षारत है तुम्हारी विरहणी, तुम्हारे शुभागमन में !!

हे प्रियवर, अपनी उर्मिला को, ह्रदय से न विस्मृत करना !
दूर नहीं हर पल संग हूँ, त्रुटियों को मेरे, क्षमा करना !!

Urmila’s letter for Laxman

 

साधना मिश्रा “समिश्रा “

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